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गुलजार Best Shayari

1. छोड़ आए हम वो गलियां,छोड़ आए हम वो गलियां।
जहां तेरे पैरों के कवँल गिला करते थे।
हंस तो दो गलों  में भंवर पड़ा करते थे।
तेरी कमर के बल पे नदी मुड़ा करती थी।
हंसी तेरी सुन कर फसल पका करती थी।
छोड़ आये हम वो गलियां।।

2.जिक्र जेहलम का है, बात है दिने की।
चाँद पुखराज का,रात पश्मीने की।।

3. छुम के फिर उठे है बादल।
टूट के फिर खुदा बरसेगा।।

4.सुबह सुबह इक ख्वाब की दस्तक पर दरवाजा खोला देखा।
सरहद के उस पार से कुछ मेहमान आये है।
सरहद पर कल रात,सुना है चाली थी गोली।
सरहद पर कल रात,सुना है
कुछ ख्वाबो का खून हुआ था।।

5.एक अकेला इस शहर में....
जीने की वजह तो कोई नहीं
मरने का बहाना ढूढ़ता है।।

6.,कहने वालों का कुछ नहीँ जाता,
सहने वाले तो कमाल करते है।।

7.चाँद के कुछ रथ तो गुजरे थे
पर चाँद से कोई उतरा नहीँ।।

8.रोज अकेली आय,रोज अकेली जाय।
चाँद कटोरा लिए रात।।

9.जिस्म जब खत्म हो और रूह को जब सांस आये
मुझसे इक नज्म का वादा है, मिलेगी मुझको।।

10. हाथ छूटें भी तो रिश्ते नहीं छोड़ा करते।
वक्त की शाख से लम्हे नहीं तोड़ा करते।।

11.क्या पता कब कहाँ से मारेगी।
बस की मैं जिंदगी से डरता हूँ।
मौत का क्या है एक बार ही मारेगी।।

12.जिस्म सौ बार जले तब भी वही मिट्टी का ढेला।
रूह एक बार जलेगी तो वो कुंदन होगी।।

13.जिस्म और जां टटोल कर देखें।
ये पिटारी भी खोल कर देखें।।

14.एक नन्ही सी नज्म मेरे सामने आ कर
मुझसे कहती है मेरा हाथ पकड़ कर,मेरे शायर
ला,मेरे कंधों पर रख दे,मैं तेरा बोझ उठा लू।।

15.थक जाओ अगर और तुमको जरूरत पड़ जाये।
इक नज्म की ऊँगली थाम के वापस आ जाना।।

16.रूह? अपनी भी किसी ने देखि है।।

17.आग क लेती है तिनको पर गुजारा लेकिन।
आशियानों को निगलती है निवालों की तरह।।

18.तुम्हारे हाथों को चूम कर, छूके अपनी आँखों से आज मैंने।
जो आयतें पढ़ नहीँ सका,उनके लम्स महसूस कर लिये है।

19. रोज उठ कर चाँद तांगा है, फलक पे रात को
रोज दिन की रौशनी में रात तक आया किये
हाथ भर के फासले को उम्र भर चलना पड़ा।

20. उड़ते जाते हुए पंछी ने बस इतना ही देखा
देर तक हाथ हिलती रही वह शोख फिजा में
अलविदा कहने को या पास बुलाने के लिये।

21.रात के पेड़ पे कल ही देखा था
चाँद,बस,पक के जिरगे वाला था
सूरज आया था,जरा उसकी तलाशी लेना।

22.आओ सारे पहन लें आईने
सारे देखेंगे अपना ही चेहरा
सबको,सारे हंसी लगेंगे यहाँ।!

23.ज़मी भी उसकी,जमीं की ये नेमतें उसकी
ये सब उसी का है, घर भी,ये घर के बन्दे भी।
खुदा से कहिये,कभी वो भी अपने घर आये!!

24.एक से घर है सभी,एक से बाशिंदे है
अजनबी शहर में,कुछ अजनबी लगता ही नहीं
एक-से दर्द है सब, एक से ही रिश्ते है।

25.तेरे शहर पहुंच तो जाता
रस्ते में दरिया पड़ते है!
पुल सब तूने जला दिये थे!

26.आओ ज़बाने बाँट ले अपनी अपनी हम
न तुम सुनोगे बात,न हम को समझना है
दो अनपढों को कितनी मुहब्बत है अदब से।

27.खुशबु जैसे लोग मिले अफ़साने में।
एक पुराना खत खोला अनजाने में।।
दिल पर दस्तक देने कोन आ निकला है।
किसकी आहट सुनता हूँ वीराने में।।
हम इस मोड़ से उठ कर अगले मोड़ चले।
उन को शायद उम्र लगेगी आने में।।

28.मुझे अँधेरे में बेशक बिठा दिया होता।
मगर चिराग की सूरत जला दिया होता।।
न रौशनी कोई आती मेरे टी अबुक में।
जो अपने आप को मैंने बुझा दिया होता।।

29.कोई खामोश जख्म लगती है
जिंदगी एक नज्म लगती है।
जीते रहने का हुक्म है लेकिन
मरते रहने की रस्म लगती है।

30.कुछ ख्वाबों के खत इनमें,कुछ चाँद के आयने, सूरज की शुआयएं है।
नज्मों के किफ़ाफे में कुछ मेरे तजुर्बे है, कुछ मेरी दुवाएं है,
निकलोगे सफर पे जब ये साथ में रख लेना,शायद कहीँ काम आयं।।

31.बारिश होती है तो पानी को भी लग जाते है पाँव,
दरों दीवार से टकरा के गुजारता है गली से।

32.रोज सुबह अखबार मेरे घर
खून में लथपथ आता है।

33.तू इतनी करीब है कि तुझे देखूँ तो कैसे
थोड़ी सी अलग हो तो तेरे चहरे को देखूँ।

34.कोई चिंगारी नहीं जलती कहीं ठंडे बदन में।
बाझँ होगी वो कोई,जिसने मुझे जन्म दिया है।।

35.कोई नहीं आयेगा ये कीड़े निकालने अब,
की इनको तो शहर में धुंआ देके मारा जाता है नालियों में।।

36.मैं किस वतन की तलाश में यूँ चला था घर से।
की अपने घर में भी अजनबी हो गया हूँ आकर।।

37.ख्याल रखना की जिंदगी की कोई भी सिलवट,
न मौत के पाक साफ चहरे के साथ जाय।।

38.रात के आने से पहले ही कहीँ, काश,ये दिन
गिर के मर जाए किसी ठंडे से साहिल के करीब
रात आयेगी तो फिर जख्म कुरेदेगी मेरे।।

39.और मालूम है? जब देखा था ये ख्वाब तुम्हारा,
अपने बिस्तर पे मैं उस वक्त पड़ा जाग रहा था।।

40.माँ ने एक चाँद सी दुल्हन की दुवाएं दी थी,
आज की रात जो फुटपाथ से देखा मैंने,
रात भर रोटी नजर आया है वो चाँद मुझे।।

41.तूने फुकों से हटाऐ है पहाड़ों के पहाड़
मेरे तलवे में लुढ़कता हुआ कंकर है, जरा उसको हटा दे।।