Next Page 1 (बशीर बद्र Best Gazals)

11.        यूँ ही बेसबब न फिर करो

यूँ बेसबब ना फिरा करो,कोई शाम घर भी रहा करो,
वह ग़ज़ल की सच्ची किताब है उसे चुपके चुपके पढ़ा करो।
कोई हाथ भी न मिलायेगा जो गले मिलोगे तपाक से,
ये नये मिजाज का शहर है जरा फासले से मिला करो।
अभी राह में कई मोड़ है, कोई आयेगा कोई जायेगा,
तुझे जिसने दिल से भुला दिया उसे भूलने की दुआ करो।
मुझे इश्तहार सी लगती है ये मुहब्बतों की कहानियां,
जो कहा नहीं वो सुना करो जो सुना नहीं वो कहा करो।
कभी हुस्ने पर्दा नशीं भी हो जरा आशिकाना लिबास में,
जो मैं बन सँवर के कहीँ चलूँ मेरे साथ तुम भी चला करो।
नहीं बे हिजाब वो चाँद सा की नजर का कोई असर न हो,
उसे इतनी गर्मी-ए-शौक से बड़ी देर तक न तका करो।
ये खिजां की जर्द सी शाल मेँ जो उदास पेड़ के पास है,
ये तुम्हारे घर की बाहर है इसे आँसुओं से हरा करो।।

12.             अभी इस तरफ ना निगाह कर

अभी इस तरह न निगाह कर मैं गजल की पलकें सवार लूँ,
मेरा लफ्ज हो आईना तुझ्र आइने में उतार लूँ।
मैं तमाम दिन का थका हुआ तू तमाम शब का जगा हुआ,
जरा ठहर जा उसी मोड़ पर तेरे साथ शाम गुजार लूं।
अगर आस्मां की नुमायशों में मुझे भी इजने कायम हो,
तो मैं मोतियों की दूकान से तेरी बालियों तेरे हार लूँ।
कहीं और बाँट दे शोहरतें कहीँ और बख्श दे इज्जतें,
मेरे पास है मेरा आईना मैं कभी न गर्द ओ गुबार लूँ।
कई अजनबी तेरी राह में,मेरे पास से यूँ गुजर गये,
जिन्हे देखकर यूँ त्तड़प हुई तेरा नाम ले के पुकार लूँ।।

13.    परखना मत

परखना मत,परखने में कोई अपना नहीं रहता,
किसी भी आईने में देर तक चेहरा नहीं रहता।
बड़े लोगों से मिलने में हमेशा फासला रखना,
जहाँ दरियाँ समंदर से मिला दरियाँ नहीं रहता।
हजारों शेर मेरे सो गये कागज़ की कब्रो मेँ,
अजब माँ हूँ कोई मेरा बच्चा जिन्दा नहीं रहता।
मुहब्बत एक खुशबु है हमेशा साथ चलती है,
कोई इन्सान तन्हाई में भी तन्हा नहीं रहता।
कोई बादल नये मौसम का फिर ऐलान करता है,
खिजां के बाग़ में जब एक भी पत्ता नहीं रहता।
तुम्हारा शहर तो बिलकुल नये अंदाज वाला है,
हमारे शहर में भी अब कोई हम सा नहीँ रहता।

14.          नाम उसी का

नाम उसी का नाम सवेरे शाम लिखा,
शेर लिखा या खत उसको गुमनाम लिखा।
उस दिन पहला फूल खिला जब पतझड़ ने,
पत्ती पत्ती तोड़ के तेरा नाम लिखा।
उस बच्चे की कापी अक्सर पड़ता हूँ,
सूरज में माथे पर जिसने शाम लिखा।
कैसे दोनों वक्त गले मिलते है रोज,
ये मंजर मैंने दुश्मन के नाम लिखा।
हिंदुस्तान का मजहब दिल का मजहब है,
प्यार को पूजा चाहत को इस्लाम लिखा।
मंदिर मस्जिद पानी की दीवारें है,
पानी की दीवार वे किसने नाम लिखा।
मीर कबीर बशीर इसी मकतब के है,
आ दिल के मकतब में अपना नाम लिखा।।

15. लगता  है

चांदनी रात है घर धुप का घर लगता है,
दिल मेरा आग में उड़ता हुआ पर लगता है।
आज अहसास में इक सांप छुपा बैठा है,
फूल से हाथ मिलाते हुए डर लगता है।
जिन्दगी तूने मुझे कब्र से कम दी है जमीन,
पाँव फैलाऊं तो दीवार में सर लगता है।
चाँद मेहराब पे सोई इक आयत है,
बेवजू आँखें है, पढ़ते हुए डर लगता है।
बूत भी रखे है नमाजें भी अदा होती है,
ये मेरा दिन नहीं,अल्लाह का घर लगता है।।

16.         रात आँखों में

रात आँखों में ढली पलकों पे जुगनू आए,
हम हवाओ की तरह जा कर उसको छू आए।
बस गई है मेरे अहसास में ये कैसी महक,
कोई खुशबु मैं लगाऊँ तेरी खुशबु आए।
उसने छू कर मुझे पत्थर से फिर इंसान किया,
मुद्दतों बात मेरी आँखों में आंसू आए।
मेरा आईना भी अब मेरी तरह पागल है,
आईना देखने जाऊं तो नजर तू आए।
किस तकल्लुक़ से गले मिलने का मौसम आया,
कुछ कागज के फूल लिए काँच के बाजू आए।
उन फकीरों को गजल अपनी सुनाते रहियो,
जिनकी आवाज में दरगाहों की खुशबु आए।।

17.         मुझको अपनी नजर

मुझको अपनी नजर ऐ खुदा चाहिए,
कुछ नहीं और इसके सिवा चाहिये।
एक दिन तुझसे मिलने जरूर आऊंगा,
जिंदगी मुझको तेरा पता चाहिए।
इस जमाने ने लोगों को समझा दिया,
तुमको आँखें नहीं आईना चाहिए।
तुमसे मेरी कोई दुश्मनी तो नहीँ,
सामने से हटो, रास्ता चाहिए।।

18.    खुशबु की तरह

खुश्बू की तरह आया को तेज हवाओं में,
माँगा था जिसे हमने दिन रात दुआओं में।
तुम छत पे नहीं आए,मैं घर से नहीं निकला,
ये चाँद बहुत भटका सावन की घटाओं में।
इस शहर में इक लड़की बिल्कुल है गजल जैसी,
बिजली सी घटाओं में,खुशबु सी हवाओं में।
मौसम का इशारा है खुश रहने दो बच्चों को,
मासूम मुहब्बत है फूलों की ख़ताओं में।
भगवान ही भेजेंगे चावल से भरी थाली,
मजलूम परिंदो की मासूम सभाओं में।
दादा बड़े भोले थे,सबसे यही करते थे,
कुछ जहर भी होता है अंग्रेजी दवाओं में।।


19.      नहीं मिलना

लहरों में डूबते रहे दरिया नहीं मिला,
उससे बिछड़ के फिर वैसा नहीं मिला।
वो भी बहुत अकेला है शायद मेरी तरह,
उसको भी कोई चाहने वाला नहीं मिला।
साहिल पे कितने लोग मेरे साथ साथ थे,
तूफान की जद मेँ आया तो तिनका नहीं मिला।
दो चार दिन तो कितने सुकूँ से गुजर गए,
सब खरियत रही,कोई अपना नहीं मिला।


20.    हमारे हाथों में

हमारे हाथों में एक शक्ल चाँद जैसी थी,
तुम्हें ये कैसे बताएँ वो रात कैसी थी।
महक रहे थे मेरे होठ' उसकी खुशबू से,
अजीब आग यी बिल्कुल गुलाब जेसी थी।
इसी में सब थे मेरी माँ, बहन भी, बीवी भी
 समझ रहा था जिसे मैं वो ऐसी वैसी थी
तूम्हारे घर के सभी रास्तों को काट गई ,
 हमारे साथ में कोई लकीर ऐसी थी ।

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