हम जवाब क्या देते


हम उसको अपनी मुहब्बत का हिसाब क्या देते,
जवाब खुद ही सवाल पूछे तो हम ज़वाब क्या देते…

एक मासूम बच्चे ने तितली के पंखों को नोच डाला,
अब उसकी नादानी का हम उसको सिला क्या देते…

पहली बार आंखो ने सच को झूठ बोलते देखा,
अब हम अपनी बेगुनाही का सबूत क्या देते….

जिस शख्स की चाहत में हमने दुवाएं मांगी हों,
अब उसकी बेवफाई में हम उसे बद्दुआ क्या देते…

जो कुछ दूर तक अपनी जुबां पर ना चल सके,
ऐसे अपाहिज को हम अपना सहारा क्या देते…

जो समंदर सारी नदियां पी कर भी प्यासा हो,
उसकी प्यास में आंख का एक आंसू क्या देते …

तुफान में जख्मी होकर एक परिंदा जमी पर गिरा,
हम खुद टूटकर बिखरे थे तो हौंसला क्या देते…

कुछ रास्तों के बारे वो हमसे अक्सर पूछते थे,
जिन रास्तों पर गए नहीं तो मशवरा क्या देते …

मौत मेरे घर की दहलीज पर मेरे इंतजार में थी,
अब हम अपनी जान ना देते तो भला क्या देते…

आशीष रसीला

मां पर बेहतरीन शेर

चलती फिरती हुई आँखों से अज़ाँ देखी है
मैं ने जन्नत तो नहीं देखी है माँ देखी है

अभी ज़िंदा है माँ मेरी मुझे कुछ भी नहीं होगा
मैं घर से जब निकलता हूँ दुआ भी साथ चलती है

इस तरह मेरे गुनाहों को वो धो देती है
माँ बहुत ग़ुस्से में होती है तो रो देती है

किसी को घर मिला हिस्से में या कोई दुकाँ आई
मैं घर में सब से छोटा था मिरे हिस्से में माँ आई

किसी को घर मिला हिस्से में या कोई दुकाँ आई
मैं घर में सब से छोटा था मिरे हिस्से में माँ आई

दुआ को हात उठाते हुए लरज़ता हूँ
कभी दुआ नहीं माँगी थी माँ के होते हुए

जब भी कश्ती मिरी सैलाब में आ जाती है
माँ दुआ करती हुई ख़्वाब में आ जाती है

एक मुद्दत से मिरी माँ नहीं सोई 'ताबिश'
मैं ने इक बार कहा था मुझे डर लगता है

कल अपने-आप को देखा था माँ की आँखों में
ये आईना हमें बूढ़ा नहीं बताता है

तेरे दामन में सितारे हैं तो होंगे ऐ फ़लक
मुझ को अपनी माँ की मैली ओढ़नी अच्छी लगी

मुनव्वर माँ के आगे यूँ कभी खुल कर नहीं रोना
जहाँ बुनियाद हो इतनी नमी अच्छी नहीं होती

बर्बाद कर दिया हमें परदेस ने मगर
माँ सब से कह रही है कि बेटा मज़े में है

ये ऐसा क़र्ज़ है जो मैं अदा कर ही नहीं सकता
में जब तक घर न लौटूँ मेरी माँ सज्दे में रहती है

माँ बाप और उस्ताद सब हैं ख़ुदा की रहमत
है रोक-टोक उन की हक़ में तुम्हारे ने'मत

माँ की आग़ोश में कल मौत की आग़ोश में आज
हम को दुनिया में ये दो वक़्त सुहाने से मिले

किताबों से निकल कर तितलियाँ ग़ज़लें सुनाती हैं
टिफ़िन रखती है मेरी माँ तो बस्ता मुस्कुराता है

जब चली ठंडी हवा बच्चा ठिठुर कर रह गया
माँ ने अपने ला'ल की तख़्ती जला दी रात को

मैं ने कल शब चाहतों की सब किताबें फाड़ दें
सिर्फ़ इक काग़ज़ पे लिक्खा लफ़्ज़-ए-माँ रहने दिया

सब ने माना मरने वाला दहशत-गर्द और क़ातिल था
माँ ने फिर भी क़ब्र पे उस की राज-दुलारा लिक्खा था

दिन भर की मशक़्क़त से बदन चूर है लेकिन
माँ ने मुझे देखा तो थकन भूल गई है

आज फिर माँ मुझे मारेगी बहुत रोने पर
आज फिर गाँव में आया है खिलौने वाला

मुद्दतों ब'अद मयस्सर हुआ माँ का आँचल
मुद्दतों ब'अद हमें नींद सुहानी आई


ऐ रात मुझे माँ की तरह गोद में ले ले
दिन भर की मशक़्क़त से बदन टूट रहा है

दूर रहती हैं सदा उन से बलाएँ साहिल
अपने माँ बाप की जो रोज़ दुआ लेते हैं

शहर में आ कर पढ़ने वाले भूल गए
किस की माँ ने कितना ज़ेवर बेचा था

बच्चे फ़रेब खा के चटाई पे सो गए
इक माँ उबालती रही पथर तमाम रात

शहर के रस्ते हों चाहे गाँव की पगडंडियाँ
माँ की उँगली थाम कर चलना बहुत अच्छा लगा

इस लिए चल न सका कोई भी ख़ंजर मुझ पर
मेरी शह-रग पे मिरी माँ की दुआ रक्खी थी

माँ ख़्वाब में आ कर ये बता जाती है हर रोज़
बोसीदा सी ओढ़ी हुई इस शाल में हम हैं

एक लड़का शहर की रौनक़ में सब कुछ भूल जाए
एक बुढ़िया रोज़ चौखट पर दिया रौशन करे

बोसे बीवी के हँसी बच्चों की आँखें माँ की
क़ैद-ख़ाने में गिरफ़्तार समझिए हम को

माँ ने लिखा है ख़त में जहाँ जाओ ख़ुश रहो
मुझ को भले न याद करो घर न भूलना

माँ मुझे देख के नाराज़ न हो जाए कहीं
सर पे आँचल नहीं होता है तो डर होता है

घर से निकले हुए बेटों का मुक़द्दर मालूम
माँ के क़दमों में भी जन्नत नहीं मिलने वाली

बहन की इल्तिजा माँ की मोहब्बत साथ चलती है
वफ़ा-ए-दोस्ताँ बहर-ए-मशक़्कत साथ चलती है

सामने माँ के जो होता हूँ तो अल्लाह अल्लाह
मुझ को महसूस ये होता है कि बच्चा हूँ अभी

मैं ने माँ का लिबास जब पहना
मुझ को तितली ने अपने रंग दिए

अब इक रूमाल मेरे साथ का है
जो मेरी वालिदा के हाथ का है

शायद यूँही सिमट सकें घर की ज़रूरतें
'तनवीर' माँ के हाथ में अपनी कमाई दे

हवा दुखों की जब आई कभी ख़िज़ाँ की तरह
मुझे छुपा लिया मिट्टी ने मेरी माँ की तरह

वो लम्हा जब मिरे बच्चे ने माँ पुकारा मुझे
मैं एक शाख़ से कितना घना दरख़्त हुई

किस शफ़क़त में गुँधे हुए मौला माँ बाप दिए
कैसी प्यारी रूहों को मेरी औलाद किया

सुरूर-ए-जाँ-फ़ज़ा देती है आग़ोश-ए-वतन सब को
कि जैसे भी हों बच्चे माँ को प्यारे एक जैसे हैं

भारी बोझ पहाड़ सा कुछ हल्का हो जाए
जब मेरी चिंता बढ़े माँ सपने में आए

फिराख गोरखपुरी रुबाइयां

तू हाथ को जब हाथ में ले लेती है
दुख दर्द ज़माने के मिटा देती है
संसार के तपते हुए वीराने में
सुख शांत की गोया तू हरी खेती है

खोते हैं अगर जान तो खो लेने दे
ऐसे में जो हो जाए वो हो लेने दे
एक उम्र पड़ी हैं सब्र भी कर लेंगे
इस वक़्त तो जी भर के रो लेने दे

करते नहीं कुछ तो काम करना क्या आए
जीते-जी जान से गुज़रना क्या आए
रो रो के मौत माँगने वालों को
जीना नहीं आ सका तो मरना क्या आए


पाते जाना है और न खोते जाना
हँसते जाना है और न रोते जाना
अव्वल और आख़िरी पयाम-ए-तहज़ीब
इंसान को इंसान है होते जाना

अमृत वो हलाहल को बना देती है
ग़ुस्से की नज़र फूल खिला देती है
माँ लाडली औलाद को जैसे ताड़े
किस प्यार से प्रेमी को सज़ा देती है

मुखड़ा देखें तो माह-पारे छुप जाएँ
ख़ुर्शीद की आँख के शरारे छुप जाएँ
रह जाना वो मुस्कुरा के तेरा कल रात
जैसे कुछ झिलमिला के तारे छुप जाएँ

ग़ुंचे को नसीम गुदगुदाए जैसे
मुतरिब कोई साज़ छेड़ जाए जैसे
यूँ फूट रही है मुस्कुराहट की किरन
मंदिर में चराग़ झिलमिलाए जैसे

आँखों में वो रस जो पत्ती पत्ती धो जाए
ज़ुल्फ़ों के फ़ुसूँ से मार-ए-सुम्बुल सो जाए
जिस वक़्त तू सैर-ए-गुलिस्ताँ करता हो
हर फूल का रंग और गहरा हो जाए

क़तरे अरक़-ए-जिस्म के मोती की लड़ी
है पैकर-ए-नाज़ कि फूलों की छड़ी
गर्दिश में निगाह है कि बटती है हयात
जन्नत भी है आज उमीदवारों में खड़ी

ऐ रूप की लक्ष्मी ये जल्वों का राग
ये जादू-ए-काम-रूप ये हुस्न की आग
ख़ैर ओ बरकत जहान में तेरे दम से
तेरी कोमल हँसी मोहब्बत का सुहाग

यूँ इश्क़ की आँच खा के रंग और खिले
यूँ सोज़-ए-दरूँ से रू-ए-रंगीं चमके
जैसे कुछ दिन चढ़े गुलिस्तानों में
शबनम सूखे तो गुल का चेहरा निखरे

चढ़ती हुई नद्दी है कि लहराती है
पिघली हुई बिजली है कि बल खाती है
पहलू में लहक के भेंच लेती है वो जब
क्या जाने कहाँ बहा ले जाती है

ये शोला-ए-हुस्न जैसे बजता हो सितार
हर ख़त्त-ए-बदन की लौ में मद्धम झंकार
रंगीन निगाह से खिल उठते हैं चमन
रस होंटों का पी के झूम उठती है बहार

बन-बासियों में जलवा-ए-गुलशन ले कर
तारीकियों में शोला-ए-ऐमन ले कर
वो हँसती हुई रूप की देवी आई
काँटों में खिले फूल सा जौबन ले कर

सहरा में ज़माँ मकाँ के खो जाती हैं
सदियों बेदार रह के सो जाती हैं
अक्सर सोचा किया हूँ ख़ल्वत में 'फ़िराक़'
तहज़ीबें क्यूँ ग़ुरूब हो जाती हैं

हर जल्वे से इक दर्स-ए-नुमू लेता हूँ
लबरेज़ कई जाम-ओ-सुबू लेता हूँ
पड़ती है जब आँख तुझ पर ऐ जान-ए-बहार
संगीत की सरहदों को छू लेता हूँ

अफ़्लाक पे जब परचम-ए-शब लहराया
साक़ी ने भरा साग़र-ए-मह छलकाया
कुछ सोच के कुछ देर तअम्मुल कर के
उस ने भी ज़रा पर्दा-ए-रुख़ सरकाया

जब किरनें हिमालिया की चोटी गूँधें
सोए हुए आबशार आँखें खोलें
जब कंचन नीर सी झलकती हो फ़ज़ा
ऐसे में काश तिरी आहट पाएँ

राहत इंदौरी चुनिंदा ग़ज़ल

अब अपनी रूह के छालों का कुछ हिसाब करूँ
मैं चाहता था चिराग़ों को आफ़ताब करूँ
बुतों से मुझको इजाज़त अगर कभी मिल जाए
तो शहर भर के ख़ुदाओं को बेनक़ाब करूँ
मैं करवटों के नए ज़ाविए लिखूँ शब भर
ये इश्क़ है तो कहाँ ज़िन्दगी अज़ाब करूँ
है मेरे चारों तरफ़ भीड़ गूँगे-बहरों की
किसे ख़तीब बनाऊँ किसे ख़िताब करूँ
उस आदमी को बस एक धुन सवार रहती है
बहुत हसीं है ये दुनिया इसे ख़राब करूँ
ये ज़िन्दगी जो मुझे क़र्ज़दार करती है
कहीं अकेले में मिल जाए तो हिसाब करूँ

हाथ ख़ाली हैं तेरे शहर से जाते-जाते
जान होती तो मेरी जान लुटाते जाते
अब तो हर हाथ का पत्थर हमें पहचानता है
उम्र गुज़री है तेरे शहर में आते-जाते
रेंगने की भी इजाज़त नहीं हमको वरना
हम जिधर जाते नए फूल खिलाते जाते
मुझको रोने का सलीक़ा भी नहीं है शायद
लोग हँसते हैं मुझे देख के आते-जाते
अबके मायूस हुआ यारों को रुख़्सत करके
जा रहे थे तो कोई ज़ख़्म लगाते जाते
हमसे पहले भी मुसाफ़िर कई गुज़रे होंगे
कम से कम राह के पत्थर तो हटाते जाते

सवाल घर नहीं बुनियाद पर उठाया है
हमारे पाँव की मिट्‌टी ने सर उठाया है
हमेशा सर पे रही एक चटान रिश्तों की
ये बोझ वो है जिसे उम्र भर उठाया है
मेरी ग़ुलेल के पत्थर का कारनामा था
मगर ये कौन है जिसने समर उठाया है
यही ज़मीं में दबाएगा एक दिन मुझको
ये आसमान जिसे दोश1 पर उठाया है
बलन्दियों को पता चल गया है फिर
मैंने हवा का टूटा हुआ एक पर उठाया है
महाबली से बग़ावत बहुत ज़रूरी थी
क़दम ये हमने समझ-सोचकर उठाया है

मैं बस्ती में आख़िर किससे बात करूँ
मेरे जैसा कोई पागल भेजो ना

सिर्फ़ ख़ंजर ही नहीं आँखों में पानी चाहिए
ऐ ख़ुदा दुश्मन भी मुझको ख़ानदानी चाहिए
मैंने अपनी ख़ुश्क आँखों से लहू छलका दिया
एक समन्दर कह रहा था मुझको पानी चाहिए
शहर की सारी अलिफ़ लैलाएँ बूढ़ी हो गईं
शाहज़ादे को कोई ताज़ा कहानी चाहिए
मैंने ऐ सूरज तुझे पूजा नहीं समझा तो है
मेरे हिस्से में भी थोड़ी धूप आनी चाहिए
मेरी क़ीमत कौन दे सकता है इस बाज़ार में
तुम ज़ुलैख़ा हो तुम्हें क़ीमत लगानी चाहिए
ज़िन्दगी है एक सफ़र और ज़िन्दगी की राह में
ज़िन्दगी भी आए तो ठोकर लगानी चाहिए

जितने अपने थे सब पराए थे
हम हवा को गले लगाए थे
जितनी क़समें थीं सब थीं
शर्मिन्दा जितने वादे थे सर झुकाए थे
जितने आँसू थे सब थे बेग़ाने
जितने मेहमाँ थे बिन बुलाए थे
सब किताबें पढ़ी-पढ़ाई थीं
सारे क़िस्से सुने-सुनाए थे
एक बंजर ज़मीं के सीने में मैंने
कुछ आसमाँ उगाए थे
वरना औक़ात क्या थी सायों की
धूप ने हौसले बढ़ाए थे
सिर्फ़ दो घूँट प्यास की ख़ातिर
उम्र भर धूप में नहाए थे
हाशिए पर खड़े हुए हैं
हम हमने ख़ुद हाशिए बनाए थे
मैं अकेला उदास बैठा था
शाम ने क़हक़हे लगाए थे
है ग़लत उसको बेवफ़ा कहना
हम कहाँ के धुले-धुलाए थे
आज काँटों भरा मुक़द्दर है
हमने गुल भी बहुत खिलाए थे

उँगलियाँ यूँ न सब पे उठाया करो
ख़र्च करने से पहले कमाया करो
ज़िन्दगी क्या है ख़ुद ही समझ जाओगे
बारिशों में पतंगें उड़ाया करो
दोस्तों से मुलाक़ात के नाम पर नी
म की पत्तियों को चबाया करो
अपने सीने पे दो गज़ ज़मीं बाँधकर
आसमानों का ज़र्फ़ आज़माया करो
चाँद-सूरज कहाँ, अपनी मंज़िल कहाँ
ऐसे-वैसों को मुँह मत लगाया करो

पहली शर्त जुदाई है
इश्क़ बड़ा हरजाई है
गुम हैं होश हवाओं के
किसकी ख़ुशबू आई है
ख़्वाब क़रीबी रिश्तेदार
लेकिन नींद परायी है
चाँद तराशे सारी उम्र
तब कुछ धूप कमाई है
मैं बिछड़ा हूँ डाली से
दुनिया क्यों मुरझाई है
दिल पर किसने दस्तक दी
तुम हो या तनहाई है
दरिया-दरिया नाप चुके
मुट्‌ठी भर गहराई है
सूरज टूट के बिखरा है
रात ने ठोकर खाई है
कोई मसीहा क्या जाने
ज़ख़्म है या गहराई है
वाह रे पागल, वाह रे दिल
अच्छी क़िस्मत पाई है

दरमियाँ एक ज़माना रक्खा जाए
तब कोई पल सुहाना रक्खा जाए
सर पे सूरज सवार रहता है
पीठ पर शामियाना रक्खा जाए
तो, ये अब तय हुआ कि अपने साथ कोई
अपने सिवा न रक्खा जाए
ख़ूब बातें रहेंगी रस्ते पर
धूप से दोस्ताना रक्खा जाए
हों निगाहें ज़मीन पर लेकिन
आसमाँ पर निशाना रक्खा जाए
ज़ख़्म पर ज़ख़्म का गुमाँ न रहे
ज़ख़्म इतना पुराना रक्खा जाए
दिल लुटाने में एहतियात रखें
ये ख़ज़ाना खुला न रक्खा जाए
नील पड़ते रहें जबीनों पर
पत्थरों को ख़फ़ा न रक्खा जाए
यार! अब उसकी बेवफ़ाई का नाम
कुछ शायराना रक्खा जाए

मौसम की मनमानी है
आँखों-आँखों पानी है
साया-साया लिख डालो
दुनिया धूप-कहानी है
सब पर हँसते रहते हैं
फूलों की नादानी है
हाय ये दुनिया! हाय ये लोग
हाय! ये सब कुछ फ़ानी है
साथ एक दरिया रख लेना
रस्ता रेगिस्तानी है
कितने सपने देख लिये
आँखों को हैरानी है
दिल वाले अब कम-कम हैं
वैसे क़ौम पुरानी है
बारिश, दरिया, सागर, ओस
आँसू पहला पानी है
तुझको भूले बैठे हैं
क्या ये कम क़ुरबानी है
दरिया हमसे आँखें मिला
देखें कितना पानी है

दाव पर मैं भी दाव पर तू भी
बेख़बर मैं भी बेख़बर तू भी
आसमाँ मुझसे दोस्ती कर ले
दर-बदर मैं भी दर-बदर तू भी
कुछ दिनों शहर की हवा खा ले
सीख जाएगा सब हुनर तू भी
मैं तेरे साथ तू किसी के साथ
हमसफ़र मैं भी हमसफ़र तू भी
हैं वफ़ाओं के दोनों दावेदार
मैं भी इस पुल-सिरात पर तू भी
ऐ मेरे दोस्त तेरे बारे में कुछ
अलग राय थी मगर, तू भी

हौसले ज़िन्दगी के देखते हैं
चलिए कुछ रोज़ जी के देखते हैं
नींद पिछली सदी से ज़ख़्मी है
ख़्वाब अगली सदी के देखते हैं
रोज़ हम एक अँधेरी धुन्ध के पार
क़ाफ़िले रौशनी के देखते हैं
धूप इतनी कराहती क्यों है
छाँव के ज़ख़्म सी के देखते हैं
टकटकी बाँध ली है आँखों ने
रास्ते वापसी के देखते हैं
बारिशों से तो प्यास बुझती नहीं
आइए ज़हर पी के देखते हैं

उंगलियां यूं न सब पर उठाया करो
ख़र्च करने से पहले कमाया करो
ज़िन्दगी क्या है ख़ुद ही समझ जाओगे
बारिशों में पतंगें उड़ाया करो
दोस्तों से मुलाक़ात के नाम पर
नीम की पत्तियों को चबाया करो
शाम के बाद जब तुम सहर देख लो
कुछ फ़क़ीरों को खाना खिलाया करो
अपने सीने पे दो गज़ ज़मीं बांध कर
आसमानों का ज़र्फ़ आज़माया करो
चांद सूरज कहां , अपनी मन्ज़िल कहां
ऐसे वैसों को मुंह मत लगाया करो

हौसले ज़िन्दगी के देखते हैं
चलिए कुछ रोज़ जी के देखते हैं
नींद पिछली सदी से ज़ख़्मी है
ख़वाब अगली सदी के देखते हैं
रोज़ हम इस अंधेरी धुंध के पार
क़फ़िले रोशनी के देखते हैं
धूप इतनी कराहती क्यों है
छांव के ज़ख़्म सी के देखते हैं
टकटकी बांध ली है आंखों ने
रास्ते वापसी के देखते हैं
बारिशों से तो प्यास बुझती नहीं
आइए ज़हर पी के देखते हैं

ज़िन्दगी की हर कहानी बे असर हो जाएगी
हम न होंगे तो यह दुनिया दर ब दर हो जाएगी
पांव पत्थर करके छोड़ेगी अगर रुक जाइये
चलते रहिए तो ज़मीं भी हमसफ़र हो जाएगी
जुगनुओं को साथ लेकर रात रोशन कीजिए
रास्ता सूरज का देखा तो सहर हो जाएगी
ज़िन्दगी भी काश मेरे साथ रहती उम्र भर
ख़ैर अब जैसे भी होनी है बसर हो जाएगी
तुम ने ख़ुद ही सर चढ़ाई थी सो अब चक्खो मज़ा
मैं ना कहता था , कि दुनिया दर्द - ए - सर हो जाएगी
तलख़ियां भी लाज़मी हैं ज़िन्दगी के वास्ते
इतना मीठा बन के मत रहिये शकर हो जाएगी

नज़ारा देखिये कलियों के फूल होने का
यही है वक्त दुआएं क़बूल होने का
उन्हें बताओं के ये रास्ते सलीब के हैं
जो लोग करते हैं दावा रसूल होने का
तमाम उम्र गुज़रने के बाददुनिया में
पता चला हमेंअपनेफ़ुज़ूल होनेका
उसूल वाले हैं बेचारे इन फ़रिश्तों ने
मज़ा चखा ही नहीं बे उसूल होने का
है आसमां से बुलन्द उसका मर्तबा जिसको शर्फ़ है
आप के कदमों की धूल होने का
चलो फ़लक पे कहीं मन्ज़िलें तलाश करें
ज़मीं पे कुछ नहीं हासिल हसूल होने का

हमारा ज़िक्र भी अब जुर्म हो गया है
वहां दिनों की बात है महफ़िल की आबरू हम थे

मुहब्बतों के सफ़र पर निकल के देखूंगा
ये पुल सिरात अगर है तो चलकेदेखूंगा
सवाल ये है कि रफ़्तार किसकी कितनी है
मैंआफ़ताबसे आगे निकलके देखूंगा
गुज़ारिशोंका कुछ उस पर असरनहीं होता
वह अब मिलेगा तो लहजा बदल के देखूंगा
मज़ाकअच्छा रहेगा यह चांद तारों से
मैं आज शाम से पहले ही ढल के देखूंगा
अजब नहीं के वही रोशनी मुझे मिल जाये
मैं अपने घर से किसी दिन निकल के देखूंगा
उजालेबांटनेवालों पे क्या गुज़रती है
किसी चिराग़ की मानिन्द जल के देखूंगा

जितना देख आये हैं अच्छा है , यही काफ़ी है
अब कहांजाइये दुनिया है , यही काफ़ी है
हमसे नाराज़ है सूरज कि पड़े सोते हैं
जागउठने का इरादाहै यहीकाफ़ी है
अब ज़रूरी तो नहीं है के वह फलदार भी हो
शाख से पेड़ का रिश्ता है यही काफ़ी है
लाओ मैं तुमको समुन्दर के इलाक़े लिख दूं
मेरे हिस्से में ये क़तरा है यही काफ़ी है
गालियों से भी नवाज़े तो करम है उसका
वह मुझे याद तो करता है यही काफ़ी है
अब अगर कम भी जियें हम तो कोई रंज नहीं
हमको जीने का सलीक़ा है यही काफ़ी है
क्या ज़रूरी है कभी तुम से मुलाक़ातभीहो
तुमसे मिलने की तमन्ना है यही काफ़ी है
अब किसी और तमाशे की ज़रूरत क्या है
ये जो दुनिया का तमाशा है यही काफ़ी है
औरअब कुछ भी नहीं चाहिये सामाने - सफ़र
पांव है , धूप है , सेहरा है यही काफ़ी है
अब सितारों पे कहां जायें तनाबें लेकर
ये जो मिट्‌टी का घरौंदा है यही काफ़ी है

सबको रुसवा बारी बारी कियाकरो
एहर मौसममेंफ़तवे जारी किया करो
रातों का नींदों सेरिश्ता टूट चुका
अपनेघरकीपहरेदारी कियाकरो
क़तरा क़तरा शबनम गिन कर क्या होगा
दरियाओंकी दावेदारी कियाकरो
राेज़ क़सीदे लिखाे गूंगे बहराें के
फ़ुरसत हाे ताे ये बेगारीकियाकरो
शब भर आने वाले दिन के ख़्वाब बनो
दिनभर फ़िक्र - ए - शब बेदारी किया करो
चांदज़्यादारोशनहै तोरहनेदो
जुगनू भय्या जी मतभारी किया करो
जब जी चाहे मौत बिछा दो बस्ती में
लेकिन बातेंप्यारी - प्यारीकिया करो
रात बदनदरियामें रोज़ उतरती है
इस कश्ती में खूबसवारीकिया करो
रोज़वही एक कोशिश ज़िन्दा रहने की
मरने की भी कुछ तय्यारीकिया करो
कागज़ को सब सौंप दिया ये ठीक नहीं
शेर कभी ख़ुद पर भी तारी किया करो

ऊंघती रहगुज़र के बारे में
लोग पूछेंगे घर के बारे में
मील के पत्थरों से पूछता हूं
अपने एक हमसफ़र के बारे में
मश्वरा कर रहे हैं आपस में
चन्द जुगनू सहर के बारे में
एक सच्ची ख़बर सुनानी है
एक झूठी ख़बर के बारे में
उंगलियों से लहू टपकता है
क्या लिखें चारागर के बारे में
लाख वह गुमशुदा सही लेकिन
जानता है खिज़र के बारे में

अंधेरे चारों तरफ सांय सांय करने लगे
चिराग़ हाथ उठा कर दुआएं करने लगे
तरक़्क़ी कर गये बीमारियों के सौदागर
ये सब मरीज़ हैं जो अब दुआएं करने लगे
ज़मीं पर आ गये आंखों से टूट कर आंसू
बुरी ख़बर है फ़रिश्ते ख़ताएं करने लगे
झुलस रहे हैं यहां छांव बांटने वाले
वह धूप है के शजर इल्तिजाएं करने लगे
अजीब रंग था मजलिस का , खूब महफ़िल थी
सफ़ेदपोश उठे कांय कांय करने लगे

दुष्यंत कुमार के चुनिंदा शेर


‌कैसे आकाश में सूराख़ नहीं हो सकता
एक पत्थर तो तबीअ'त से उछालो यारो

‌मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही
हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए

‌कहाँ तो तय था चराग़ाँ हर एक घर के लिए
कहाँ चराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिए

‌ज़िंदगी जब अज़ाब होती है
आशिक़ी कामयाब होती है

‌सिर्फ़ हंगामा खड़ा करना मिरा मक़्सद नहीं
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए

‌एक आदत सी बन गई है तू
और आदत कभी नहीं जाती

‌तुम्हारे पावँ के नीचे कोई ज़मीन नहीं
कमाल ये है कि फिर भी तुम्हें यक़ीन नहीं

‌ये सारा जिस्म झुक कर बोझ से दोहरा हुआ होगा
मैं सज्दे में नहीं था आप को धोका हुआ होगा


‌यहाँ तक आते आते सूख जाती है कई नदियाँ
मुझे मालूम है पानी कहाँ ठहरा हुआ होगा

‌हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए

‌लहू-लुहान नज़ारों का ज़िक्र आया तो
शरीफ़ लोग उठे दूर जा के बैठ गए

‌मैं जिसे ओढ़ता बिछाता हूँ
वो ग़ज़ल आप को सुनाता हूँ

‌नज़र-नवाज़ नज़ारा बदल न जाए कहीं
ज़रा सी बात है मुँह से निकल न जाए कहीं

‌वो आदमी नहीं है मुकम्मल बयान है
माथे पे उस के चोट का गहरा निशान है

‌न हो क़मीज़ तो पाँव से पेट ढक लेंगे
ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफ़र के लिए

‌मस्लहत-आमेज़ होते हैं सियासत के क़दम
तू न समझेगा सियासत तू अभी नादान है

‌मस्लहत-आमेज़ होते हैं सियासत के क़दम
तू न समझेगा सियासत तू अभी नादान है

‌तिरा निज़ाम है सिल दे ज़बान-ए-शायर को
ये एहतियात ज़रूरी है इस बहर के लिए

दुष्यंत कुमार की बेहतरीन गजलें

वो आदमी नहीं है मुकम्मल बयान है
माथे पे उस के चोट का गहरा निशान है

वो कर रहे हैं इश्क़ पे संजीदा गुफ़्तुगू
मैं क्या बताऊँ मेरा कहीं और ध्यान है

सामान कुछ नहीं है फटे-हाल है मगर
झोले में उस के पास कोई संविधान है

उस सर-फिरे को यूँ नहीं बहला सकेंगे आप
वो आदमी नया है मगर सावधान है

फिस्ले जो उस जगह तो लुढ़कते चले गए
हम को पता नहीं था कि इतनी ढलान है

देखे हैं हम ने दौर कई अब ख़बर नहीं
पावँ तले ज़मीन है या आसमान है

वो आदमी मिला था मुझे उस की बात से
ऐसा लगा कि वो भी बहुत बे-ज़बान है
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ये जो शहतीर है पलकों पे उठा लो यारो
अब कोई ऐसा तरीक़ा भी निकालो यारो

दर्द-ए-दिल वक़्त को पैग़ाम भी पहुँचाएगा
इस कबूतर को ज़रा प्यार से पालो यारो

लोग हाथों में लिए बैठे हैं अपने पिंजरे
आज सय्याद को महफ़िल में बुला लो यारो

आज सीवन को उधेड़ो तो ज़रा देखेंगे
आज संदूक़ से वो ख़त तो निकालो यारो

रहनुमाओं की अदाओं पे फ़िदा है दुनिया
इस बहकती हुई दुनिया को सँभालो यारो

कैसे आकाश में सूराख़ नहीं हो सकता
एक पत्थर तो तबीअ'त से उछालो यारो

लोग कहते थे कि ये बात नहीं कहने की
तुम ने कह दी है तो कहने की सज़ा लो यारो
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होने लगी है जिस्म में जुम्बिश तो देखिए
इस पर कटे परिंदे की कोशिश तो देखिए

गूँगे निकल पड़े हैं ज़बाँ की तलाश में
सरकार के ख़िलाफ़ ये साज़िश तो देखिए

उन की अपील है कि उन्हें हम मदद करें
चाक़ू की पसलियों से गुज़ारिश तो देखिए

बरसात आ गई तो दरकने लगी ज़मीन
सूखा मचा रही है ये बारिश तो देखिए

जिस ने नज़र उठाई वही शख़्स गुम हुआ
इस जिस्म के तिलिस्म की बंदिश तो देखिए

एक गुड़िया की कई कठ-पुतलियों में जान है
आज शाइ'र ये तमाशा देख कर हैरान है

ख़ास सड़कें बंद हैं तब से मरम्मत के लिए
ये हमारे वक़्त की सब से सही पहचान है

एक बूढ़ा आदमी है मुल्क में या यूँ कहो
इस अँधेरी कोठरी में एक रौशन-दान है

मस्लहत-आमेज़ होते हैं सियासत के क़दम
तू न समझेगा सियासत तू अभी नादान है

कल नुमाइश में मिला वो चीथड़े पहने हुए
मैं ने पूछा नाम तो बोला कि हिंदुस्तान है
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जाने किस किस का ख़याल आया है
इस समुंदर में उबाल आया है

एक बच्चा था हवा का झोंका
साफ़ पानी को खँगाल आया है

एक ढेला तो वहीं अटका था
एक तू और उछाल आया है

कल तो निकला था बहुत सज-धज के
आज लौटा तो निढाल आया है

ये नज़र है कि कोई मौसम है
ये सबा है कि वबाल आया है

हम ने सोचा था जवाब आएगा
एक बेहूदा सवाल आया है

अगर ख़ुदा न करे सच ये ख़्वाब हो जाए
तिरी सहर हो मिरा आफ़्ताब हो जाए

हुज़ूर आरिज़-ओ-रुख़्सार क्या तमाम बदन
मिरी सुनो तो मुजस्सम गुलाब हो जाए

उठा के फेंक दो खिड़की से साग़र-ओ-मीना
ये तिश्नगी जो तुम्हें दस्तियाब हो जाए

वो बात कितनी भली है जो आप करते हैं
सुनो तो सीने की धड़कन रबाब हो जाए

बहुत क़रीब न आओ यक़ीं नहीं होगा
ये आरज़ू भी अगर कामयाब हो जाए

ग़लत कहूँ तो मिरी आक़िबत बिगड़ती है
जो सच कहूँ तो ख़ुदी बे-नक़ाब हो जाए
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पक गई हैं आदतें बातों से सर होंगी नहीं
कोई हंगामा करो ऐसे गुज़र होगी नहीं

इन ठिठुरती उँगलियों को इस लपट पर सेंक लो
धूप अब घर की किसी दीवार पर होगी नहीं

बूँद टपकी थी मगर वो बूंदों बारिश और है
ऐसी बारिश की कभी उन को ख़बर होगी नहीं

आज मेरा साथ दो वैसे मुझे मा'लूम है
पत्थरों में चीख़ हरगिज़ कारगर होगी नहीं

आप के टुकड़ों के टुकड़े कर दिए जाएँगे पर
आप की ताज़ीम में कोई कसर होगी नहीं

सिर्फ़ शाइ'र देखता है क़हक़हों की असलियत
हर किसी के पास तो ऐसी नज़र होगी नहीं

रोज़ जब रात को बारह का गजर होता है
यातनाओं के अँधेरे में सफ़र होता है

कोई रहने की जगह है मिरे सपनों के लिए
वो घरौंदा ही सही मिट्टी का भी घर होता है

सिर से सीने में कभी पेट से पाँव में कभी
इक जगह हो तो कहें दर्द इधर होता है

ऐसा लगता है कि उड़ कर भी कहाँ पहुँचेंगे
हाथ में जब कोई टूटा हुआ पर होता है

सैर के वास्ते सड़कों पे निकल आते थे
अब तो आकाश से पथराव का डर होता है
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ये शफ़क़ शाम हो रही है अब
और हर गाम हो रही है अब

जिस तबाही से लोग बचते थे
वो सर-ए-आम हो रही है अब

अज़मत-ए-मुल्क इस सियासत के
हाथ नीलाम हो रही है अब

शब ग़नीमत थी लोग कहते हैं
सुब्ह बदनाम हो रही है अब

जो किरन थी किसी दरीचे की
मरक़ज-ए-बाम हो रही है अब

तिश्ना-लब तेरी फुसफुसाहट भी
एक पैग़ाम हो रही है अब

All time 2 line best Shayari

और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा

रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ
आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ

हम को मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन
दिल के ख़ुश रखने को 'ग़ालिब' ये ख़याल अच्छा है

अपने चेहरे से जो ज़ाहिर है छुपाएँ कैसे
तेरी मर्ज़ी के मुताबिक़ नज़र आएँ कैसे

इश्क़ ने 'ग़ालिब' निकम्मा कर दिया
वर्ना हम भी आदमी थे काम के

हम आह भी करते हैं तो हो जाते हैं बदनाम
वो क़त्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होता

ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले
ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है

उस की याद आई है साँसो ज़रा आहिस्ता चलो
धड़कनों से भी इबादत में ख़लल पड़ता है

मोहब्बत में नहीं है फ़र्क़ जीने और मरने का
उसी को देख कर जीते हैं जिस काफ़िर पे दम निकले

इस सादगी पे कौन न मर जाए ऐ ख़ुदा
लड़ते हैं और हाथ में तलवार भी नहीं

ज़िंदगी तू ने मुझे क़ब्र से कम दी है ज़मीं
पाँव फैलाऊँ तो दीवार में सर लगता है

अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें
जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें

सितारों से आगे जहाँ और भी हैं
अभी इश्क़ के इम्तिहाँ और भी हैं

होश वालों को ख़बर क्या बे-ख़ुदी क्या चीज़ है
इश्क़ कीजे फिर समझिए ज़िंदगी क्या चीज़ है

बहुत पहले से उन क़दमों की आहट जान लेते हैं
तुझे ऐ ज़िंदगी हम दूर से पहचान लेते हैं

अच्छा ख़ासा बैठे बैठे गुम हो जाता हूँ
अब मैं अक्सर मैं नहीं रहता तुम हो जाता हूँ

मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंज़िल मगर
लोग साथ आते गए और कारवाँ बनता गया

हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले
बहुत निकले मिरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले

कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी
यूँ कोई बेवफ़ा नहीं होता

एक मुद्दत से तिरी याद भी आई न हमें
और हम भूल गए हों तुझे ऐसा भी नहीं

वो अफ़्साना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन
उसे इक ख़ूब-सूरत मोड़ दे कर छोड़ना अच्छा

न जी भर के देखा न कुछ बात की
बड़ी आरज़ू थी मुलाक़ात की

माना कि तेरी दीद के क़ाबिल नहीं हूँ मैं
तू मेरा शौक़ देख मिरा इंतिज़ार देख

ज़िंदगी ज़िंदा-दिली का है नाम
मुर्दा-दिल ख़ाक जिया करते हैं

हम को मिटा सके ये ज़माने में दम नहीं
हम से ज़माना ख़ुद है ज़माने से हम नहीं

दोनों जहान तेरी मोहब्बत में हार के
वो जा रहा है कोई शब-ए-ग़म गुज़ार के

जहाँ रहेगा वहीं रौशनी लुटाएगा
किसी चराग़ का अपना मकाँ नहीं होता

इन्हीं पत्थरों पे चल कर अगर आ सको तो आओ
मिरे घर के रास्ते में कोई कहकशाँ नहीं है

किस किस को बताएँगे जुदाई का सबब हम
तू मुझ से ख़फ़ा है तो ज़माने के लिए आ


बड़े लोगों से मिलने में हमेशा फ़ासला रखना
जहाँ दरिया समुंदर से मिला दरिया नहीं रहता

राह-ए-दूर-ए-इश्क़ में रोता है क्या
आगे आगे देखिए होता है क्या

पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल हमारा जाने है
जाने न जाने गुल ही न जाने बाग़ तो सारा जाने है

कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता
कहीं ज़मीन कहीं आसमाँ नहीं मिलता

ये जब्र भी देखा है तारीख़ की नज़रों ने
लम्हों ने ख़ता की थी सदियों ने सज़ा पाई

ऐ मोहब्बत तिरे अंजाम पे रोना आया
जाने क्यूँ आज तिरे नाम पे रोना आया

उम्र-ए-दराज़ माँग के लाई थी चार दिन
दो आरज़ू में कट गए दो इंतिज़ार में

यहाँ लिबास की क़ीमत है आदमी की नहीं
मुझे गिलास बड़े दे शराब कम कर दे

नहीं आती तो याद उन की महीनों तक नहीं आती
मगर जब याद आते हैं तो अक्सर याद आते हैं

हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी
जिस को भी देखना हो कई बार देखना

तुम मुख़ातिब भी हो क़रीब भी हो
तुम को देखें कि तुम से बात करें

ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता
अगर और जीते रहते यही इंतिज़ार होता

दोस्ती जब किसी से की जाए
दुश्मनों की भी राय ली जाए

मुसाफ़िर हैं हम भी मुसाफ़िर हो तुम भी
किसी मोड़ पर फिर मुलाक़ात होगी

अंदाज़ अपना देखते हैं आइने में वो
और ये भी देखते हैं कोई देखता न हो

कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से
ये नए मिज़ाज का शहर है ज़रा फ़ासले से मिला करो

ये इश्क़ नहीं आसाँ इतना ही समझ लीजे
इक आग का दरिया है और डूब के जाना है

तुम को आता है प्यार पर ग़ुस्सा
मुझ को ग़ुस्से पे प्यार आता है

कैसे आकाश में सूराख़ नहीं हो सकता
एक पत्थर तो तबीअ'त से उछालो यारो

इक लफ़्ज़-ए-मोहब्बत का अदना ये फ़साना है
सिमटे तो दिल-ए-आशिक़ फैले तो ज़माना है

हम से क्या हो सका मोहब्बत में
ख़ैर तुम ने तो बेवफ़ाई की

वो आए घर में हमारे ख़ुदा की क़ुदरत है
कभी हम उन को कभी अपने घर को देखते हैं

सुर्ख़-रू होता है इंसाँ ठोकरें खाने के बा'द
रंग लाती है हिना पत्थर पे पिस जाने के बा'द

उल्टी हो गईं सब तदबीरें कुछ न दवा ने काम किया
देखा इस बीमारी-ए-दिल ने आख़िर काम तमाम किया

आईना क्यूँ न दूँ कि तमाशा कहें जिसे
ऐसा कहाँ से लाऊँ कि तुझ सा कहें जिसे

तुम से बिछड़ कर ज़िंदा हैं
जान बहुत शर्मिंदा हैं

दिल के फफूले जल उठे सीने के दाग़ से
इस घर को आग लग गई घर के चराग़ से

सदा ऐश दौराँ दिखाता नहीं
गया वक़्त फिर हाथ आता नहीं

तिरे माथे पे ये आँचल बहुत ही ख़ूब है लेकिन
तू इस आँचल से इक परचम बना लेती तो अच्छा था

घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो यूँ कर लें
किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाए

चले तो पाँव के नीचे कुचल गई कोई शय
नशे की झोंक में देखा नहीं कि दुनिया है

पत्थर के जिगर वालो ग़म में वो रवानी है
ख़ुद राह बना लेगा बहता हुआ पानी है

सूरज हूँ ज़िंदगी की रमक़ छोड़ जाऊँगा
मैं डूब भी गया तो शफ़क़ छोड़ जाऊँगा

सूरज हूँ ज़िंदगी की रमक़ छोड़ जाऊँगा
मैं डूब भी गया तो शफ़क़ छोड़ जाऊँगा

दिया ख़ामोश है लेकिन किसी का दिल तो जलता है
चले आओ जहाँ तक रौशनी मा'लूम होती है

सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है ज़ोर कितना बाज़ू-ए-क़ातिल में है

सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है ज़ोर कितना बाज़ू-ए-क़ातिल में है

सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है ज़ोर कितना बाज़ू-ए-क़ातिल में है

सुब्ह होती है शाम होती है
उम्र यूँही तमाम होती है

सुब्ह होती है शाम होती है
उम्र यूँही तमाम होती है

मुन्नवर राना best शायरी

ऐसे उडूँ कि जाल न आए ख़ुदा करे 

रस्ते में अस्पताल न आए ख़ुदा करे 


ये मादरे वतन है, मेरा मादरे वतन 

इस पर कभी ज़वाल न आए ख़ुदा करे


 अब उससे दोस्ती है तो फिर दोस्ती रहे 

शीशे पे कोई बाल न आए ख़ुदा कर


किसी के ज़ख्म पर चाहत से पट्टी कौन बाँधेगा

 अगर बहनें नही होंगी तो राखी कौन बाँधेगा 

जहाँ लड़की की इज़्ज़त लूटना इक खेल बन जाए

 वहाँ पर ये कबूतर तेरे चिट्ठी कौन बाँधेगा

 ये बाज़ारे सियासत है यहाँ ख़ुददारियाँ कैसी

 सभी के हाथ में कासा है मुट्ठी कौन बाँधेगा

 तुम्हारी महफ़िलों में हम बड़े बूढ़े ज़रूरी हैं

 अगर हम ही नहीं होंगे तो पगड़ी कौन बाँधेगा

 परेशाँ तो यहाँ पर सब हैं लेकिन तय नहीं होता

 कि बिल्ली के गले में बढ़ के घंटी कौन बाँधेगा


मसनद नशीन हो के न कुर्सी पे बैठ कर 

गुज़रेंगे पुलसिरात से नेकी पे बैठ कर

 इस अह्द में हज़ार के नोटों की क़द्र है

 गाँधी भी ख़ुश नहीं थे चवन्नी पे बैठकर 

गेहूँ के साथ धुन को भी पिसते हुए जनाब

 देखा है हमने गाँव की चक्की पे बैठ कर

 बच्चे को अपने दाना भराती थी

 फ़ाख़्ता माँ के समान पेड़ की टहनी पे बैठ कर 

रिश्ता कबूतरों से मेरा बचपने का है 

खाते थे मेरे साथ चटाई पे बैठ कर 

यादों की रेल आज वहीं आ के रुक गई 

खेले थे हम जहाँ कभी पटरी पे बैठकर


जिसने भी इस ख़बर को सुना सर पकड़ लिया

 कल इक दिये ने आँधी का कालर पकड़ लिया

 उसकी रगों में दौड़ रहा था मेरा लहू 

बेटे ने बढ़ के दस्ते सितमगर पकड़ लिया

 जिसकी बहादुरी के क़सीदे लिखे गए 

निकला शिकार पर तो कबूतर पकड़ लिया

 इक उम्र तक तो मुझको रहा तेरा इन्तिज़ार

 फिर मेरी आरज़ूओं ने बिस्तर पकड़ लिया

 तितली ने एहतिजाज की क़िस्मत संवार दी 

भौंरे ने जब कभी उसे छत पर पकड़ लिया



अपने बाज़ू पे मुक़द्दस सी इक आयत बाँधे

 घर से निकला हूँ इमामों की ज़मानत बाँधे 

कितना मुश्किल है विरासत को बचाए रखना 

दर ब दर फिरता हूँ गठरी में शराफ़त बाँधे 

रात के ख़्वाब की ताबीर से डर लगता है

 कुछ ज़िना ज़ादे थे दस्तारे फ़ज़ीलत बाँधे 

ज़िन्दगी रोज़ मुझे ले के निकल पड़ती है 

अपनी मुट्ठी में कई लोगों की क़िस्मत बाँधे 

हम गुनहगार सही, उनसे बहुत अच्छे हैं 

जो खड़े रहते हैं दरबारों में नीयत बाँधे 

हम तो उठ आए हैं उस कूचए दिलदारी से

 चाहे अब जैसे भी धुँधरू ये सियासत बाँधे

 माँ को इक बार नहीं आधी सदी देखा है

 अपने आँचल में बुजर्गों की नसीहल बाँध



आ कहीं मिलते हैं हम ताकि बहारें आ जायें 

इससे पहले कि तअल्लुक़ में दरारें आ जायें 

ये जो ख़ुददारी का मैला सा अँगोछा है मेरा 

मैं अगर बेच दूँ इसको कई कारें आ जायें 

दुश्मनी हो तो फिर ऐसी कि कोई एक रहे

 या तअल्लुक़ हो तो ऐसा ही पुकारें आ जायें 

ज़िन्दगी दी है तो फिर इतनी सी मोहलत दे

 दे एक कम ज़र्फ़ का एहसान उतारें आ जायें 

ये भी मुमकिन है उन्हीं में कहीं हम लेटे हों

 तुम ठहर जाना जो रस्ते में मज़ारे आ जायें

 हाय, क्या लोग थे हर शाम दुआ करते थे

 लौट कर सारे परिन्दों की क़तारें आ जाएं



लौट कर जैसे भी हो जाने पिदर! आ जाना

 ऐसी वैसी जो ख़बर सुनना तो घर आ जाना 

वक़्ते रुख़्सत मुझे इज्ज़त से सलामी देने

 जब डुबोने लगे दरिया तो नज़र आ जाना

 यह अना होती ही ऐसी है इसे क्या कीजै 

आम सी बात है बेटे में असर आ जाना 

मौत ख़ुद अपने ठिकाने पे बुला लेती है

 हमने देखा है मियाँ च्यूँटी के पर आ जाना

 आज भी उसके तसव्वुर से सुकूँ मिलता है

 जैसे सहरा में कोई पेड़ नज़र आ जाना


तेरी महफ़िल से अगर हम न निकाले जाते

 हम तो मर जाते मगर तुझको बचा ले जाते 

दबदबा बाक़ी है दुनिया में अभी तक

 वर्ना लोग मिंबर से इमामों को उठा ले जाते

 बेवफ़ाई ने हमें तोड़ दिया है 

वर्ना गिरते पड़ते ही सही ख़ुद को संभाले जाते

 हर घड़ी मौत तक़ाज़े को खड़ी रहती है 

कब तलक हम उसे वादे पे टाले जाते



ग़ज़ल हर अह्द में हम से सलीक़ा पूछने आई

 बरेली में कहाँ मिलता है सुर्मा पूछने आई

मैं जब दुनिया में था तो हाल तक पूछा नहीं मेरा 

मैं जब चलने लगा तो सारी दुनिया पूछने आई


बुलन्दी देर तक किस शख़्स के हिस्से में रहती है

 बहुत ऊँची इमारत हर घड़ी ख़तरे में रहती है

 बहुत जी चाहता है क़ैदे-ए-जाँ से हम निकल जायं

 तुम्हारी याद भी लेकिन इसी मलबे में रहती है

 यह ऐसा क़र्ज़ है जो मैं अदा कर ही नहीं सकता

 मैं जब तक घर न लौटूँ मेरी माँ सजदे में रहती है 

अमीरी रेशम-ओ-कमख़्वाब में नंगी नज़र आयी

 ग़रीबी शान से एक टाट के परदे में रहती है 

मैं इन्सां हूँ बहक जाना मेरी फ़ितरत में शामिल है

 हवा भी उसको छू कर देर तक नश्शे में रहती है 

मुहब्बत में परखने-जाँचने से फ़ायदा क्या है

 कमी थोड़ी-बहुत हर एक के शिजरे में रहती है

 ये अपने आपको तक़्सीम कर लेता है सूबों में

 ख़राबी बस यही हर मुल्क के नक़्शे में रहती है



मुहब्बत करने वालों में ये झगड़ा डाल देती है 

सियासत दोस्ती की जड़ में मट्टा डाल देती है

 तवायफ़ की तरह अपने ग़लत कामों के चेहरे पर 

हुकूमत मन्दिर-ओ-मस्जिद का पर्दा डाल देती है 

हुकूमत मुँह-भराई के हुनर से ख़ूब वाक़िफ़ है 

ये हर कुत्ते के आगे शाही टुकड़ा डाल देती है 

कहाँ की हिजरतें, कैसा सफ़र, कैसा जुदा होना 

किसी की चाह पैरों पर दुपट्टा डाल देती है

 ये चिड़िया भी मेरी बेटी से कितनी मिलती-जुलती है

 कहीं भी शाख़-ए-गुल देखे तो झूला डाल देती है

 भटकती है हवस दिन-रात सोने की दुकानों में

 ग़रीबी कान छिदवाती है तिनका डाल देती है

 हसद की आग में जलती है सारी रात वो औरत

 मगर सौतन के आगे अपना जूठा डाल देती है


हँसते हुए माँ बाप की गाली नहीं खाते

 बच्चे हैं तो क्यों शौक़ से मिट्टी नहीं खाते 

तुझ से नहीं मिलने का इरादा तो है लेकिन

 तुझसे न मिलेंगे ये क़सम भी नहीं खाते

 सो जाते हैं फुटपाथ पे अख़बार बिछाकर

 मज़दूर कभी नीदं की गोली नहीं खाते

 बच्चे भी ग़रीबी को समझने लगे शायद 

अब जाग भी जाते हैं तो सहरी नहीं खाते

 दावत तो बड़ी चीज़ है हम जैसे क़लंदर 

हर एक के पैसे की दवा भी नहीं खाते

 अल्लाह ग़रीबों का मददगार है ‘राना’

 हम लोगों के बच्चे कभी सर्दी नहीं खाते


मेरी ख़्वाहिश है कि फिर से मैं फ़रिश्ता हो जाऊँ

 माँ से इस तरह लिपट जाऊँ कि बच्चा हो जाऊँ 

कम-से-कम बच्चों के होंटों की हँसी की ख़ातिर 

ऐसी मिट्टी में मिलाना कि खिलौना हो जाऊँ 

सोचता हूँ तो छलक उठती हैं मिरी आँखें

 तेरे बारे में न सोचूँ तो अकेला हो जाऊँ 

चारागर तेरी महारत पे यक़ीं है लेकिन

 क्या ज़रूरी है कि हर बार मैं अच्छा हो जाऊँ 

बेसबब इश्क़ में मरना मुझे मंजूर नहीं 

शमा तो चाह रही है कि पतंगा हो जाऊं 

शायरी कुछ भी हो, रुसवा नहीं होने देती

 मैं सियासत में चला जाऊँ तो नंगा हो जाऊँ



फ़रिश्ते आ के उनके जिस्म पर ख़ुशबू लगाते हैं 

वो बच्चे रेल के डिब्बों में जो झाड़ू लगाते हैं 

अँधेरी रात में अक्सर सुनहरी मशअलें लेकर 

परिन्दों की मुसीबत का पता जुगनू लगाते हैं 

दिलों का हाल आसानी से कब मालूम होता है

 कि पेशानी पे चन्दन तो सभी साधू लगाते हैं

 ये माना आपको शोले बुझाने में महारत है 

मगर वो आग जो मज़लूम के आँसू लगाते हैं

 किसी के पाँव की आहट से दिल ऐसे उछलता है 

छलाँगें जंगलों में जिस तरह आहू  लगाते हैं

 बहुत मुमकिन है अब मेरा चमन वीरान हो जाये 

सियासत के शजर पर घोंसले उल्लू लगाते हैं


घर में रहते हुए ग़ैरों की तरह होती हैं

 बेटियाँ धान के पौधों की तरह होती हैं 

उड़के एक रोज़ बहुत दूर चली जाती हैं 

घर की शाखों पे ये चिड़ियों की तरह होती हैं 

सहमी-सहमी हुई रहती हैं मकान-ए-दिल में

 आरजूएँ भी ग़रीबों की तरह होती हैं 

टूट कर ये भी बिखर जाती हैं एक लम्हें में

 कुछ उम्मीदें भी घरौदों की तरह होती हैं 

आपको देख के जिस वक़्त पलटती है

 नज़र मेरी आँखें, मेरी आँखों की तरह होती है

 बाप का रुतबा भी कुछ कम नहीं होता लेकिन

 जितनी माँएँ हैं, फ़रिश्तों की तरह होती हैं



लिपट जाता हूँ माँ से और मौसी मुस्कराती है 

मैं उर्दू में ग़ज़ल कहता हूँ और हिन्दी मुस्कराती है 

उछलते-खेलते बचपन में बेटा ढूँढती होगी 

तभी तो देख कर पोते को दादी मुस्कराती है

 तभी जा कर कहीं माँ-बाप को कुछ चैन पड़ता है

 कि जब ससुराल से घर आ के बेटी मुस्कराती है

 चमन में सुब्ह का मंज़र बड़ा दिलचस्प होता है

 कली जब सो के उठती है तो तितली मुस्कराती है

 हमें ऐ ज़िन्दगी तुझ पर हमेशा रश्क़ आता है 

मसाइल में घिरी रहती है फिर भी मुस्कराती है 

बड़ा गहरा तआल्लुक़ है सियासत से तबाही का 

कोई भी शहर जलता है तो दिल्ली मुस्कराती है



जब भी कश्ती मेरी सैलाब में आ जाती है 

माँ दुआ करती हुई ख़्वाब में आ जाती है 

रोज़ मैं अपने लहू से उसे ख़त लिखता हूँ 

रोज़ उँगली मेरी तेज़ाब में आ जाती है 

दिल की गलियों से तेरी याद निकलती ही नहीं 

सोहनी फिर इसी पंजाब में आ जाती है 

रात भर जागते रहने का सिला है शायद

 तेरी तस्वीर-सी महताब में आ जाती है 

एक कमरे में बसर करता है सारा कुनबा 

सारी दुनिया दिल-ए-बेताब में आ जाती है

 ज़िन्दगी, तू भी भिखारिन की रिदा ओढ़े हुए कूचा-ए-रेशम-ओ-कमख़्वाब में आ जाती है

 दुख किसी का हो छलक उठती हैं

 मेरी आँखें सारी मिट्टी मेरे तालाब में आ जाती है


दुख भी ला सकती है लेकिन जनवरी अच्छी लगी 

जिस तरह बच्चों को जलती फुलझड़ी अच्छी लगी 

रो रहे थे सब तो मैं भी फूट कर रोने लगा

 वरना मुझको बेटियों की रुख़सती अच्छी लगी

 ऐ ख़ुदा, तू फ़ीस के पैसे अता कर दे मुझे

 मेरे बच्चों को भी यूनीवर्सिटी अच्छी लगी

 वो सिमट जाना किसी का सुन के मेरा तज़किरा 

लालटेनों में सँभलती रोशनी अच्छी लगी

 तेरे दामन में सितारे हैं तो होंगे ऐ फ़लक

 मुझ को अपनी माँ की मैली ओढ़नी अच्छी लगी



न मैं कंघी बनाता हूँ, न मैं चोटी बनाता हूँ

 ग़ज़ल में आपबीती को मैं जगबीती बनाता हूँ 

ग़ज़ल वो सिन्फ़-ए-नाज़ुक है जिसे अपनी रफ़ाक़त से

 वो महबूबा बना लेता है मैं बेटी बनाता हूँ

 हुकूमत का हर एक इनआम है बन्दूक़साज़ी पर

 मुझे कैसे मिलेगा मैं तो बैसाखी बनाता हूँ

 मेरे आँगन की कलियों को तमन्ना शाहज़ादों की

 मगर मेरी मुसीबत ये है मैं बीड़ी बनाता हूँ 

सज़ा कितनी बड़ी है गाँव से बाहर निकलने की

 मैं मिट्टी गूँधता था अब डबलरोटी बनाता हूँ

 वज़ारत चन्द घण्टों की महल मीनार से ऊँचा 

मैं औरंग़जे़ब हूँ अपने लिए खिचड़ी बनाता हूँ

 बस इतनी इल्तजा है तुम इसे गुजरात मत करना

 तुम्हें इस मुल्क का मालिक मैं जीते-जी बनाता हूँ

 मुझे इस शहर की सब लड़कियाँ आदाब करती हैं

 मैं बच्चों की कलाई के लिए राखी बनाता हूँ 

तुझे ऐ ज़िन्दगी अब क़ैदख़ाने में गुज़रना है 

तुझे मैं इसलिए दुख-दर्द का आदी बनाता हूँ 

मैं अपने गाँव का मुखिया भी हूँ बच्चों का क़ातिल भी

 जला कर दूध कुछ लोगों की ख़ातिर घी बनाता हूँ



ऐ अँधेरे, देख ले, मुँह तेरा काला हो गया

 माँ ने आँखें खोल दीं घर में उजाला हो गया

 राई के दाने बराबर भी न था जिसका वजूद

 नफ़रतों के बीच रह कर वो हिमाला हो गया

 एक आँगन की तरह ये शहर था कल तक मगर

 नफ़रतों में टूट कर मोती की माला हो गया

 शहर को जंगल बना देने में जो मशहूर था

 आज कल सुनते हैं वो अल्लाह वाला हो गया

 हम ग़रीबों में चले आये, बहुत अच्छा किया 

आज थोड़ी देर को घर में उजाला हो गया


मिट्टी में मिला दे के जुदा हो नहीं सकता

 अब इस से ज़्यादा मैं तेरा हो नहीं सकता

 दहलीज़ पे रख दी हैं किसी शख़्स ने आँखें

 रौशन कभी इतना तो दीया हो नहीं सकता

 बस तू मेरी आवाज़ से आवाज़ मिला दे 

फिर देख कि इस शहर में क्या हो नहीं सकता

 ऐ मौत मुझे तूने मुसीबत से निकाला 

सय्याद समझता था, रिहा हो नहीं सकता

 इस ख़ाक बदन को कभी पहुँचा दे वहाँ भी

 क्या इतना करम बादे सबा हो नहीं सकता

 पेशानी को सज्दे भी अता कर मेरे मौला

 आँखों से तो ये क़र्ज अदा हो नहीं सकता

 दरबार में जाना मेरा दुश्वार बहुत है

 जो शख़्स क़लंदर हो गदा हो नहीं सकता


अमीरे शहर को तलवार करने वाला हूँ 

मैं जी हुज़ूरी से इनकार करने वाला हूँ 

कहो अँधेरे से दामन समेट ले अपना 

मैं जुगनुओं को अलमदार करने वाला हूँ

 तुम अपने शहर के हालात जान सकते हो 

मैं अपने आपको अख़बार करने वाला हूँ 

मैं चाहता था कि छूटे न साथ भाई का

 मगर वो समझा के मैं वार करने वाला हूँ

 बदन का कोई भी हिस्सा ख़रीद सकते हो

 मैं अपने जिस्म को बाज़ार करने वाला हूँ

 तुम अपनी आँखों से सुनना मेरी कहानी को

 लब-ए-ख़ामोश से इज़हार करने वाला हूँ

 हमारी राह में हाइल कोई नहीं होगा 

तू एक दरिया है मैं पार करने वाला हूँ



अगर दौलत से ही सब क़द का अंदाज़ा लगाते हैं 

तो फिर ऐ मुफ़लिसी हम दाँव पर कासा लगाते हैं

 उन्हीं को सर बुलन्दी भी अता होती है दुनिया में

 जो अपने सर के नीचे हाथ का तकिया लगाते हैं 

हमारा सानेहा ये है कि हर दौरे हुकूमत में

 शिकारी के लिए जंगल में हम हाँका लगाते हैं

 वो शाइर हों के आलिम हों के ताजिर या लुटेरे हों

 सियासत वो जुआ है जिस में सब पैसा लगाते हैं

 उगा रक्खे हैं जंगल नफ़रतों के सारी बस्ती में

 मगर गमले में मीठी नीम का पौधा लगाते हैं

ज़्यादा देर तक मुर्दे कभी रखे नहीं जाते

 शराफ़त के जनाज़े को चलो काँधा लगाते हैं

 ग़ज़ल की सल्तनत पर आज तक क़ब्ज़ा हमारा है

 हम अपने नाम के आगे अभी ‘राना’ लगाते हैं


नाकामियों के बाद भी हिम्मत वही रही

 ऊपर का दूध पी के भी ताक़त वही रही

 शायद ये नेकियाँ हैं हमारी कि हर जगह 

दस्तार के बग़ैर भी इज़्ज़त वही रही 

मैं सर झुका के शहर में चलने लगा मगर

 मेरे मुख़ालिफ़ीन में दहशत वही रही 

जो कुछ मिला था माले-ग़नीमत में लुट गया

 मेहनत से जो कमाई थी दौलत वही रही 

क़दमों में ला के डाल दीं सब नेअमतें

 मगर सौतेली माँ को बच्चे से नफ़रत वही रही

 खाने की चीज़ माँ ने जो भेजी है गाँव से

 बासी भी हो गयी है तो लज़्ज़त वही रही


कभी ख़ुशी से ख़ुशी की तरफ़ नहीं देखा 

तुम्हारे बाद किसी की तरफ़ नहीं देखा

 ये सोच कर के तेरा इंतज़ार लाज़िम है

 तमाम उम्र घड़ी की तरफ़ नहीं देखा

 यहाँ तो जो भी है आबे-रवां का आशिक़ है 

किसी ने ख़ुश्क नदी की तरफ़ नहीं देखा

 वो जिसके वास्ते परदेस जा रहा हूँ मैं 

बिछड़ते वक़्त उसी की तरफ़ नहीं देखा

 न रोक ले हमें रोता हुआ कोई चेहरा

 चले तो मुड़ के गली की तरफ़ नहीं देखा

 बिछड़ते वक़्त बहुत मुतमइन थे हम दोनों

किसी ने मुड़ के किसी की तरफ़ नहीं देखा 

रविश बुज़ुर्गों की शामिल है मेरी घुट्टी में

 ज़रूरतन भी सख़ी की तरफ़ नहीं देखा


लबों पे उसके कभी बद-दुआ नहीं होती 

बस एक माँ है जो मुझसे ख़फ़ा नहीं होती 

मैं इक फ़क़ीर के होंटों की मुस्कुराहट हूँ 

किसी से भी मेरी क़ीमत अदा नहीं होती

 मेरा ख़मीर बना है वहाँ की मिट्टी से

 जहाँ की फ़ाहशा भी बेवफ़ा नहीं होती 

धुआँ उगलती हुई गाड़ियाँ पकड़ते हैं

जो आग उगलते हैं उनको सज़ा नहीं होती


इक ज़ख़्मी परिन्दे की तरह जाल में हम हैं 

ऐ इश्क़ अभी तक तेरे जंजाल में हम हैं 

माँ ख़्वाब में आकर यह बता जाती है हर रोज़

 बोसीदा सी ओढ़ी हुई इस शाल में हम हैं 

हँसते हुए होंटों ने भरम रक्खा हमारा

 वह देखने आया था कि किस हाल में हम हैं

 अब आपकी मर्जी है सँभालें न सँभालें

 ख़ुश्बू की तरह आप के रूमाल में हम हैं 

हम फूट के रोने लगे जब मौत के डर से 

नेकी ने कहा, नामये आमाल में हम हैं 

हम थक के कहीं बैठने वाले नहीं हरगिज़

 इस हिरनी की लंगड़ाती हुई चाल में हम हैं 

इक ख़्वाब की सूरत ही सही याद है अब तक

 माँ कहती थी ले ओढ़ ले इस शाल में हम हैं



कब वापसी का हुक्म हो धड़का भी लग गया

 अब तो हमारी आँखों पे चश्मा भी लग गया

 माँ लाशऊरी तौर पे शे’रों में आ गई

 जन्नत में एक पेड़ ग़ज़ल का भी लग गया 

गौरय्या ले के जाये कहाँ अपना घोंसला

 इस पेड़ पर तो शहद का छत्ता भी लग गया

 बचपन में इतनी बात पे भी रो चुके हैं हम 

चिड़िया कहाँ से आयेगी शीशा भी लग गया 

माँ बाप ख़ुश हैं काम पे बच्चे को भेज कर

 दुनिया के कारोबार में सजदा भी लग गया 

यह मोजिज़ा भी देखा है साहिल पे एक रोज़ 

ख़िदमत में एक प्यासे की दरिया भी लग गया 

इक हाथ भी उठा न गवाही के वास्ते

 लगने को मेरे नाम पे मेला भी लग गया


दिल वो बस्ती है जहाँ कोई तमन्ना न मिली

 मैं वो पनघट हूँ जिसे कोई भी राधा न मिली

 एक ही आग में ता उम्र जले हम दोनों 

तुम को यूसुफ़ न मिला हमको ज़ुलेख़ा न मिली 

मेरा बनवास पे जाने का इरादा था मगर

 मुझ को दुनिया में कहीं भी कोई सीता न मिली

 उसने बुलवाये थे मशहूर नजूमी लेकिन

 खुरदुरे हाथ में तक़दीर की रेखा न मिली

 इत्तफ़ाक़न कभी आयी तो कोई ग़म लायी 

ऐ ख़ुशी, तू मुझे एक बार भी तनहा न मिली



मैं इसके नाज़ उठाता हूँ सो यह ऐसा नहीं करती

 यह मिट्टी मेरे हाथों को कभी मैला नहीं करती 

खिलौनों की दुकानों की तरफ़ से आप क्यों गुज़रे 

ये बच्चे की तमन्ना है यह समझौता नहीं करती

 शहीदों की ज़मीं है जिसको हिन्दुस्तान कहते हैं

 ये बंजर हो के भी बुज़दिल कभी पैदा नहीं करती

 मोहब्बत क्या है दिल के सामने मजबूर हो जाना 

जुलेख़ा वर्ना यूसुफ़ का कभी सौदा नहीं करती

 गुनहगारों की सफ़ में रख दिया मुझको ज़रूरत ने 

मैं ना महरम हूँ लेकिन मुझसे ये पर्दा नहीं करती 

अजब दुनिया है तितली के परों को नोच लेती है

 अजब तितली है पर नुचने पे भी रोया नहीं करती



मैं हूँ अगर चराग़ तो जल जाना चाहिए

 मैं पेड़ हूँ तो पेड़ को फल जाना चाहिए

 रिश्ते को क्यों उठाये कोई बोझ की तरह 

अब उसकी ज़िन्दगी से निकल जाना चाहिए

 जब दोस्ती भी फूँक के रखने लगे क़दम 

फिर दुश्मनी तुझे भी सँभल जाना चाहिए

 मेहमान अपनी मर्ज़ी से जाते नहीं कभी 

तुमको मेरे ख़याल से कल जाना चाहिए 

नौटंकी बन गया हो जहाँ पर मुशायर

 ऐसी जगह सुनाने ग़ज़ल जाना चाहिए

 इस घर को अब हमारी ज़रूरत नहीं रही 

अब आफ़ताबे उम्र को ढल जाना चाहिए



मुद्दतों पहले जो डूबी थी वो पूँजी मिल गयी 

जो कभी दरिया में फेंकी थी वो नेकी मिल गयी 

कितनी आसानी से इस ज़िल्लत से छुट्टी मिल गई

 ज़िन्दगी महँगी पड़ी थी मौत सस्ती मिल गयी

 ज़िन्दगी तुझ से वफ़ादारी का यह ईनाम है 

झुर्रियाँ चेहरों को बालों को सफ़ेदी मिल गयी

 कोई अब तन्क़ीद करता है तो करने दे उसे

 बे ज़मीरी देख! मुझको लाल बत्ती मिल गयी 

यह अमीरे शह्‌र के दरबार का क़ानून है

 जिसने सजदा कर लिया तोहफ़े में कुर्सी मिल गयी 

मैं इसी मिट्टी से उट्ठा था बगोले की तरह 

और फिर इक दिन इसी मिट्टी में मिट्टी मिल गयी

 मैं इसे ईनाम समझूँ या सज़ा का नाम दूँ 

उँगलियाँ कटते ही तोहफ़े में अँगूठी मिल गयी

 ख़ुदकुशी करने पे आमादा थी नाकामी मेरी

 फिर मुझे दीवार पर चढ़ती यह च्यूँटी मिल गयी

 फिर किसी ने लक्ष्मी देवी को ठोकर मार दी

 आज कूड़े दान में फिर एक बच्ची मिल गयी


काले कपड़े नहीं पहने हैं तो इतना कर ले 

इक ज़रा देर को कमरे में अँधेरा कर ले

 अब मुझे पार उतर जाने दे ऐसा कर ले वर्ना

 जो आये समझ में तेरी दरिया! कर ले 

ख़ुद ब ख़ुद रास्ता दे देगा ये तूफ़ान मुझे 

तुझको पाने का अगर दिल ये इरादा कर ले

 आज का काम तुझे आज ही करना होगा 

कल जो करना है तो फिर आज तक़ाज़ा कर ले 

अब बड़े लोगों से अच्छाई की उम्मीद न कर 

कैसे मुमकिन है करेला कोई मीठा कर ले 

गर कभी रोना ही पड़ जाये तो इतना रोना 

आ के बरसात तेरे सामने तौबा कर ले

 मुद्दतों बाद वह आयेगा हमारे घर में फिर से 

दिल किसी उम्मीद को ज़िन्दा कर ले

 हम सफ़र लैला भी होगी मैं तभी जाऊँगा

 मुझ पे जितने भी सितम करने हों सहरा कर ले


उदास रहने को अच्छा नहीं बताता है 

कोई भी ज़ह्‌र को मीठा नहीं बताता है 

जो जानकार हैं मिट्टी से जान लेते हैं

 शजर किसी से भी शजरा नहीं बताता है 

कल अपने आपको देखा था माँ की आँखों में

 ये आइना हमें बूढ़ा नहीं बताता है 

मोहब्बतों में ज़रूरी है बे वफ़ाई भी 

मगर इसे कोई अच्छा नहीं बताता है 

अमीरे शहर से पूछो कि उसने क्या सोचा

 फ़क़ीर अपना इरादा नहीं बताता है 

लिपट के देखिये इक रोज़ अपने दुश्मन से 

यह तजरुबा कोई अपना नहीं बताता है

 लिपट के रोने दे कुछ देर इस हवेली से

 मैं लौट आऊँगा दरिया नहीं बताता है


आपको चेहरे से भी बीमार होना चाहिए 

इश्क़ है तो इश्क़ का इज़हार होना चाहिए 

आप दरिया हैं तो फिर इस वक़्त हम ख़तरे में हैं 

आप कश्ती हैं तो हमको पार होना चाहिए 

ऐरे-ग़ैरे लोग भी पढ़ने लगे हैं इन दिनों 

आपको औरत नहीं, अख़बार होना चाहिए

 ज़िन्दगी तू कब तलक दर-दर फिरायेगी हमें

 टूटा-फूटा ही सही, घर-बार होना चाहिए

 अपनी यादों से कहो एक दिन की छुट्टी दें मुझे 

इश्क़ के हिस्से में भी इतवार होना चाहिए


मैं उसकी आँखों से छलकी शराब पीता हूँ 

फ़क़ीर हो के भी मँहगी शराब पीता हूँ 

तुझे भी देखूँ तो पहचानने में देर लगे 

कभी-कभी तो मैं इतनी शराब पीता हूँ

 मुझे नशे में बहकने कभी नहीं देता वो

 जानता है मैं कितनी शराब पीता हूँ

 पराये पैसों पे अय्यााशियाँ नहीं की हैं 

मैं जब भी पीता हूँ अपनी शराब पीता हूँ 

पुराने चाहने वालों की याद आने लगे

 इसीलिए मैं पुरानी शराब पीता हूँ



महफ़िल में आज मर्सिया ख़्वानी ही क्यों न हो 

आँखों से बहने दीजिए पानी ही क्यों न हो

 नश्शे का एहतेमाम से रिश्ता नहीं कोई 

पैग़ाम उसका आये ज़बानी ही क्यों न हो

 ऐसे ये ग़म की रात गुज़रना मुहाल है

 कुछ भी सुना मुझे, वो कहानी ही क्यों न हो 

कोई भी साथ देता नहीं उम्र भर यहाँ

 कुछ दिन रहेगी साथ जवानी ही क्यों न हो

 इस तशनगी की क़ैद से जैसे भी हो निकाल

 पीने को कुछ भी चाहिए पानी ही क्यों न हो

 दुनिया भी जैसे ताश के पत्तों का खेल है 

जोकर के साथ रहती है रानी ही क्यों न हो 

तस्वीर उसकी चाहिए हर हाल में मुझे 

पागल हो, सरफिरी हो, दिवानी ही क्यों न हो

 सोना तो यार सोना है चाहे जहाँ रहे

 बीवी है फिर भी बीवी, पुरानी ही क्यों न हो

 अब अपने घर में रहने न देंगे किसी को हम

 दिल से निकाल देंगे निशानी ही क्यों न हो


हवा के रुख़ पे रहने दो ये जलना सीख जायेगा

 कि बच्चा लड़खड़ायेगा तो चलना सीख जायेगा

 वो पहरों बैठ कर तोते से बातें करता रहता है 

चलो अच्छा है अब नज़रें बदलना सीख जायेगा 

इसी उम्मीद पर हमने बदन को कर लिया छलनी

 कि पत्थर खाते-खाते पेड़ फलना सीख जायेगा 

ये दिल बच्चे की सूरत है इसे सीने में रहने दो

 बुरा होगा जो ये घर से निकलना सीख जायेगा

 तुम अपना दिल मेरे सीने में कुछ दिन के लिए रख दो

 यहाँ रह कर ये पत्थर भी पिघलना सीख जायेगा



हिज्र में पहले-पहल रोना बहुत अच्छा लगा

 उम्र कच्ची थी तो फल कच्चा बहुत अच्छा लगा

 मैंने एक मुद्दत से मस्जिद भी नहीं देखी मगर

 एक बच्चे का अज़ाँ देना बहुत अच्छा लगा 

जिस्म पर मेरे बहुत शफ़्फ़ाफ़ कपड़े थे मगर 

धूल मिट्टी में अटा बेटा बहुत अच्छा लगा

 शहर की सड़कें हो चाहे गाँव की पगडण्डियाँ

 माँ की उँगली थाम कर चलना बहुत अच्छा लगा

 तार पर बैठी हुई चिड़ियों को सोता देख कर

 फ़र्श पर सोता हुआ बच्चा अच्छा लगा 

हम तो उसको देखने आये थे इतनी दूर से

 वो समझता था हमें मेला बहुत अच्छा लगा


ख़ुश्क था जो पेड़ उस पर पत्तियाँ अच्छी लगीं 

तेरे होंटों पर लरज़ती सिसकियाँ अच्छी लगीं

 हर सहूलत थी मयस्सर लेकिन इसके बावजूद

 माँ के हाथों की पकाई रोटियाँ अच्छी लगीं 

जिसने आज़ादी के क़िस्से भी सुने हों क़ैद में 

उस परिन्दे को क़फ़स की तीलियाँ अच्छी लगीं 

हाथ उठा कर वक़्ते-रुख़्सत जब दुआएँ उसने दीं 

उसके हाथों की खनकती चूड़ियाँ अच्छी लगीं

 हम बहुत थक-हार कर लौटे थे लेकिन जाने क्यों

 रेंगती, बढ़ती, सरकती चींटियाँ अच्छी लगीं


मुख़्तसर होते हुए भी ज़िन्दगी बढ़ जायेगी

 माँ की आँखें चूम लीजे रौशनी बढ़ जायेगी

 मौत का आना तो तय है मौत आयेगी मगर 

आप के आने से थोड़ी ज़िन्दगी बढ़ जायेगी

 इतनी चाहत से न देखा कीजिए महफ़िल में आप

 शह्‌र वालों से हमारी दुश्मनी बढ़ जायेगी 

आपके हँसने से ख़तरा और भी बढ़ जायेगा

 इस तरह तो और आँखों की नमी बढ़ जायेगी

 बेवफ़ाई खेल का हिस्सा है जाने दे उसे

 तज़किरा उससे न कर शर्मिंन्दगी बढ़ जायेगी


मुसलसल गेसुओं की बरहमी अच्छी नहीं होती

 हवा सबके लिए ये मौसमी अच्छी नहीं होती

 न जाने कब कहाँ पर कोई तुमसे ख़ूँबहा माँगे

 बदन में ख़ून की इतनी कमी अच्छी नहीं होती

 ये हम भी जानते हैं ओढ़ने में लुत्फ़ आता है 

मगर सुनते हैं चादर रेशमी अच्छी नहीं होती 

ग़ज़ल तो फूल-से बच्चों की मीठी मुस्कुराहट है

 ग़ज़ल के साथ इतनी रुस्तमी अच्छी नहीं होती

 मुनव्वर माँ के आगे यूँ कभी खुल कर नहीं रोना 

जहाँ बुनियाद हो, इतनी नमी अच्छी नहीं होती

Best Gazals of Shakil Azmi

 1.ख़ुद को इतना भी मत बचाया कर
बारिशें तो भीग जाया कर
काम ले कुछ हसीन होंटों से
बातों-बातों में मुस्कुराया कर
 दर्द हीरा है दर्द मोती है
 दर्द आँखों से मत बहाया कर
 चाँद लाकर कोई नहीं देगा
 अपने चेह्‌रे से जगमगाया कर
 धूप मायूस लौट जाती है
 छत पे कपड़े सुखाने आया कर
 कोई तस्वीर कोई अफ़साना
कुछ न कुछ रोज़ ही बनाया कर
 कौन कहता है दिल मिलाने को
 कम से कम हाथ तो मिलाया कर

2.
अपनी मन्ज़िल पे पहुँचना भी, खड़े रहना भी
 कितना मुश्किल है बड़े होके बड़े रहना भी
मसलेहत से भरी दुनिया में ये आसान नहीं
 ज़िद भी कर लेना उसी ज़िद पे अड़े रहना भी
 तेज़ आँधी में इसे मोजज़ा\ समझा जाए
 इन दरख़्तों का ज़मीनों में गड़े रहना भी
 दिल हो नाराज़ तो ख़ुशियों पे असर पड़ता है
 हर घड़ी ठीक नहीं ख़ुद से लड़े रहना भी
 फ़ास्ला करके कभी शह्‌र के हँगामों से
 अच्छा लगता है यूँ ही घर में पड़े रहना भी
काश मैं कोई नगीना नहीं पत्थर होता
 क़ैद जैसा है अँगूठी में जड़े रहना भी

3.
परों को खोल ज़माना उड़ान देखता है
ज़मीं पे बैठके क्या आसमान देखता है
जो चल रहा है निगाहों में मन्ज़िलें लेकर
 वो धूप में भी कहाँ साएबान देखता है
 खंडर में किसको महल की तलाश ले आई
ये कौन रुक के मिरी आन-बान देखता है
यही वो शह्‌र जो मेरे लबों से बोलता था
 यही वो शह्‌र जो मेरी ज़बान देखता है
मिला है हुस्न तो इस हुस्न की हिफ़ाज़त कर
 संभल के चल तुझे सारा जहान देखता है
 कनीज़ हो कोई या कोई शाहज़ादी हो
 जो इश्क़ करता है कब ख़ानदान देखता है
घटाएँ उठती हैं बरसात होने लगती है
 जब आँख भरके फ़लक को किसान देखता है
मैं जब मकान के बाहर क़दम निकालता हूँ
 अजब निगाह से मुझको मकान देखता है

4.
मर के मिट्टी में मिलूँगा, खाद हो जाऊँगा मैं
फिर खिलूँगा शाख पर आबाद हो जाऊँगा मैं
 तेरे सीने में उतर आऊँगा चुपके से कभी
फिर जुदा होकर तिरी फ़रियाद हो जाऊँगा मैं
बार-बार आऊँगा मैं तेरी नज़र के सामने
और फिर इक रोज़ तेरी याद हो जाऊँगा मैं
अपनी ज़ुल्फ़ों को हवा के सामने मत खोलना
वरना ख़ुश्बू की तरह आज़ाद हो जाऊँगा मैं
 तेरे जाने से खंडर हो जाएगा दिल का नगर
छोड़कर मत जा मुझे बरबाद हो जाऊँगा मैं

5.
हर घड़ी चश्मे-ख़रीदार में रहने के लिए
कुछ हुनर चाहिए बाज़ार में रहने के लिए
 ऐसी मजबूरी नहीं है कि चलूँ पैदल मैं
 ख़ुद को गरमाता हूँ रफ़्तार में रहने के लिए
 मैंने देखा है जो मर्दों की तरह रहते थे
 मस्ख़रे बन गए दरबार में रहने के लिए
 अब तो बदनामी से शोह्‌रत का वो रिश्ता है,
 कि लोग नंगे हो जाते हैं अख़बार में रहने के लिए
जीतना सिर्फ़ इलेक्शन ही नहीं काफ़ी है
 जंग इक और है सरकार में रहने के लिए
 शाख़े-गुल छोड़ के क्या जाने हमें क्या
 सूझी आ गये साय-ए-तलवार में रहने के लिए
 थक गया मैं तो मिरे साथ सितारे लेकर रात आई
 दरो-दीवार में रहने के लिए

6.
कहीं खोया ख़ुदा हमने कहीं दुनिया गंवाई है
बड़े शह्‌रों में रहने की बड़ी क़ीमत चुकाई है
 वो दोनों साथ चलना चाहते थे दूर तक
 लेकिन मुहब्बत करने वालों के मुक़द्दर में जुदाई है
 हमें देखो कि मर कर किस तरह ज़िन्दा बचे हैं
 हम जहाँ तन्हा हुए थे हम वहीं महफिल सजाई है
 न लफ़्ज़ों में न तस्वीरों मे देखी थी कभी हमने
 गली-कूचों ने चलते-फिरते जो सूरत दिखाई है
 कभी तो नूर फैलेगा तिरे काग़ज़ से दुनिया में
 लिखे जा जब तलक तेरे क़लम में रोशनाई है

7.
तुझसे बिछड़ के तेरी वफ़ा के बग़ैर भी
 मैं साँस ले रहा हूँ हवा के बग़ैर भी
 मैं जी गया जो तेरे बिना तो अजब है
 क्या ज़िन्दा हैं कितने लोग ख़ुदा के बग़ैर भी
दस्ते-तलब1 उठाया मगर कुछ नहीं
कहा माँगा है मैंने तुझको दुआ के बग़ैर भी
 ऐसा भी कितनी बार हुआ इन्तेज़ार में
दरवाज़ा खुल गया है सदा के बगै़र भी
 मैं रो रहा था और कोई रन्ज भी न था
 बरसात हो रही थी घटा के बग़ैर भी
 कुछ लोग जुर्म करके भी आज़ाद हैं ‘शकील’
 हमको सज़ा मिली है ख़ता के बग़ैर भी

8
.प्यार मिल जाता है, चाहत नहीं मिलती सबको
 दोस्ती में भी मुहब्बत नहीं मिलती सबको
 सैकड़ों जाते हैं दरवाज़े पे दस्तक देकर
 दिल में आने की इजाज़त नहीं मिलती सबको
सिर्फ़ मरने से अदा होती नहीं रस्मे-वफ़ा
 मौत के बाद भी जन्नत नहीं मिलती सबको
चन्द हीरों को ही मिलता है चमकने का नसीब
 काम सब करते हैं शोह्‌रत नहीं मिलती सबको
 आइने सबने दुकानों में सजा रक्खे हैं
 आइनों के लिए सूरत नहीं मिलती सबको
 देखने वाले बहुत कम हैं पसे-मन्ज़र तक
 आँख मिल जाती है हैरत नहीं मिलती सबको
कोशिशें करके भी नाकाम कई होते हैं
एक जैसी यहाँ क़िस्मत नहीं मिलती सबको
दिल को दिल्ली की तरह जीतना पड़ता है ‘शकील’
ये हुकूमत है हुकूमत नहीं मिलती सबको

9.
ख़ुद को दुख देना, उजड़ना मिरी मजबूरी है
 ज़िन्दगी तुझसे बिछड़ना मिरी मजबूरी है
टूटते रिश्ते की पोशाक का धागा हूँ मैं
अब बुनाई से उधड़ना मिरी मजबूरी है
 मैं अकेला कई लोगों से नहीं लड़ सकता
इसलिए ख़ुद से झगड़ना मिरी मजबूरी है
 वरना मर जाएगा बच्चा ही मिरे अन्दर
 का तितलियाँ रोज़ पकड़ना मिरी मजबूरी है
 कहाँ मिट्टी का दिया और कहाँ तेज़ हवा
 जलते रहना है तो लड़ना मिरी मजबूरी है
रास्तों से भी तअल्लुक़ है मिरा घर जैसा
साथ वालों से पिछड़ना मिरी मजबूरी है
 मेरा साया ही मिरे पौधों का दुश्मन ठह्‌रा
अपनी मिट्टी से उखड़ना मिरी मजबूरी है
 मैं बना ही था किसी रोज़ बिगड़ने के लिए
 सो किसी रोज़ बिगड़ना मिरी मजबूरी है
 मेरा साया ही मिरे पौधों का दुश्मन ठह्‌रा
 अपनी मिट्टी से उखड़ना मिरी मजबूरी है
मैं बना ही था किसी रोज़ बिगड़ने के लिए
 सो किसी रोज़ बिगड़ना मिरी मजबूरी है

10
छत दुआ देगी किसी के लिए ज़ीना बन जा
 डूबता देख किसी को तो सफ़ीना बन जा
रूह तो पहले से ही पाक मिली है तुझको
दिल भी कर साफ़ ज़रा और मदीना बन जा
 ज़िन्दगी देती नहीं सबको सुनहरे मौक़े
 तुझको अँगूठी मिली है तो नगीना बन जा
शौक़ ख़ुश्बू में नहाने का बहुत है जो तुझे
आ मिरे जिस्म से मिल मेरा पसीना बन जा
 आ किसी रोज़ मिरे दर्द को बादल करने
 और मिरी आँखों में बारिश का महीना बन जा

11.
पलट के देखा तो वो था न उसका साया था
 किसी ने मुझको बहुत दूर से बुलाया था
 यही फ़लक है कि जिस पर
कभी हमारे लिये तमाम रात कोई चाँद जगमगाया था
 फिर उसके बाद मैं तनहा रहा, उदास रहा
ज़रा सा मुझको किसी का ख़याल आया था
 उसी को सोच के रोई हैं बारहा आँखें
उसी को देख के इक बार मुस्कुराया था
ये ग़म निकलता नहीं मेरे जानो-दिल से
 कभी जिसे मैं अपना समझता था वो पराया था
 भरम भी रख न सका मेरी सादगी का वो मैं
जान-बूझ के जिससे फ़रेब खाया था
मिले थे घर के दरीचे भी साज़िशों में ‘शकील’
 हवा ने मेरे चरागों को जब बुझाया था ।

11.
‌मेरी बुनियाद को तामीर से पहचाना जाय
मुझको उजलत नहीं ताख़ीर से पहचाना जाय
मैं कई शक्ल में रहता हूँ बदन पर अपने
मेरा चेहरा मिरी तहरीर से पहचाना जाय
कोई समझे मिरी ख़ामोश निगाहों की सदा
 दर्द मेरा मिरी तस्वीर से पहचाना जाय
 आँख का देखा हुआ झूट भी हो सकता है
 ख़्वाब को ख़्वाब की ताबीर से पहचाना जाय
 मैनें पानी के लिए रेत उड़ाई है बहुत
 मेरी तक़दीर को तदबीर से पहचाना जाय
 मेरे काँधे से उतारे न कोई मेरी सलीब
जुर्म मेरा मिरी ताज़ीर से पहचाना जाय|
 इस अँधेरे में ये झनकार है शम्ओं की तरह
 यानी मुझको मिरी ज़नजीर से पहचाना
 जायमेरा सब कुछ मिरे माज़ी के हवाले से है
 मेरे मंगल को मिरे पीर से पहचाना जाय

‌12.
धुआँ धुआँ है फ़ज़ा, रौशनी बहुत कम है
सभी से प्यार करो ज़िन्दगी बहुत कम है
मुक़ाम जिसका फ़रिश्तों से भी ज़ियादा था
हमारी ज़ात में वो आदमी बहुत कम है
 हमारे गाँव में पत्थर भी रोया करते थे
 यहाँ तो फूल में भी ताज़गी बहुत कम है
 जहाँ है प्यास वहाँ सब गिलास ख़ाली हैं
जहाँ नदी है वहाँ तिश्नगी बहुत कम है
 ये मौसमों का नगर है यहाँ के लोगों में
हवस ज़ियादा है और आशिक़ी बहुत कम है
तुम आसमान पे जाना तो चाँद से कहना
 जहाँ पे हम हैं वहाँ चाँदनी बहुत कम है
 बरत रहा हूँ मैं लफ़्जों को इख़्तिसार के साथ
 ज़ियादा लिखना है और डायरी बहुत कम है


13.
‌चाहा, मगर गले से लगाया न जा सका
 इतना वो गिर गया कि उठाया न जा सका
 कहते हैं एक बार जिसे बद दुआ लगी
उसको किसी दवा से बचाया न जा सका
 कोशिश तो उसने की थी बहुत तोड़ने के बाद
 लेकिन मुझे दुबारा बनाया न जा सका
 जो रेत पर लिखे थे वो लहरों में खो गए
 पत्थर पे मैं लिखा था मिटाया न जा सका
मन्ज़र पे मुझको आने में कुछ देर तो लगी
लेकिन जब आ गया तो हटाया न जा सका
होंटों पे आ न पाया तो आँखों में नम हुआ
 मैं इश्क़ था किसी से छुपाया न जा सका
मैं जल गया तो राख नहीं कीमिया हुआ
मुझको किसी नदी में बहाया न जा सका

‌14.
रेत का घर हूँ, बिखरने से बचा ले मुझको
 यूँ न कर तेज़ हवाओं के हवाले मुझको
 इस तरह रूठ के मत जा मिरे सूरज मुझसे
कौन सर्दी में ओढ़ाएगा दुशाले मुझको
 चल पडूँगा तो बहुत दूर निकल जाऊँगा
वक़्त ठह्रा है अभी आ के मना ले मुझको
 शोर इतना भी नहीं है कि तुझे सुन न सकूँ
 दे के आवाज़ मिरे यार बुला ले मुझको
गर बिछड़ना ही मुक़द्दर है तो इससे पहले
 अपनी पलकों पे ज़रा देर सजा ले मुझको
मेरे ऐबों पे ज़रा देर को पर्दा रख दे
मैं बुरा हूँ तो भलाई से निभा ले मुझको

15.
चाँद में ढलने, सितारों में निकलने के लिए
 मैं तो सूरज हूँ बुझूँगा भी तो जलने के लिए
 मन्ज़िलों! तुम ही कुछ आगे की तरफ़ बढ़ जाओ
रास्ता कम है मिरे पाँव को चलने के लिए
ज़िन्दगी अपने सवारों को गिराती जब है
 एक मौक़ा भी नहीं देती संभलने के लिए|
 मैं वो मौसम जो अभी ठीक से छाया भी नहीं
साज़िशें होने लगीं मुझको बदलने के लिए
 वो तिरी याद के शोले हों कि अहसास मिरे
कुछ न कुछ आग ज़रूरी है पिघलने के लिए
 ये बहाना तिरे दीदार की ख़्वाहिश का है
हम जो आते हैं इधर रोज़ टहलने के लिए
 महफ़िले-इश्क़ में शम्ओं की ज़रूरत क्या है
 दिल को ही मोम बनाते हैं पिघलने के लिए

16.

‌दुनिया इक दरिया है, पार उतरना भी तो है बेईईमानीकर लूँ लेकिन मरना भी तो है पत्थर हूँ भगवान बना रह सकता हूँ कब तक रेज़ा-रेज़ा हो के मुझे बिखरन भी तो है ऐसे मुझको मारो कि क़ातिल भी ठहरूँ मैं आखिर ये इल्ज़ाम किसी पे धरना भी तो है दिल से तुम निकले हो तो कोई और सही कोई और ये जो ख़ालीपन है इसको भरना भी तो है बाँध बनाने वालों को मालूम नहीं शायद पानी जो ठह्रा है उसे गुज़रना भी तो है साहिल वालो! अभी तमाशा ख़त्म नहीं मेरा डूब रहा हूँ लेकिन मुझे उभरना भी तो है अच्छी है या बुरी है चाहे जैसी है दुनिया आया हूँ तो कुछ दिन यहाँ ठहरना भी तो है




अपनी हस्ती को मिटा दूँ तिरे जैसा हो जाऊँ इस तरह चाहूँ तुझे मैं तिरा हिस्सा हो जाऊँ पायलें बाँध के बारिश की करुँ रक़्से-जुनूँ1 तू घटा बनके बरस और मैं सह्‌रा2 हो जाऊँ दूर तक ठह्‌रा हुआ झील का पानी हूँ मैं तेरी परछाईं जो पड़ जाए तो दरिया हो जाऊँ शह्‌र-दर-शह्‌र मिरे इश्क़ की नौबत बाजे मैं जहाँ जाउँ तिरे नाम से रुस्वा हो जाऊँ आदमी बनके बहुत मैनें तुझे सजदे किए तू ख़ुदा बन के मुझे मिल मैं फ़रिश्ता हो जाऊँ इस तरह मिल कि बिछड़ने का तसव्वुर न रहे इस तरह माँग मुझे तू कि मैं तेरा हो जाऊँ इतना बीमार कि साँसों से धुआँ उठता है आ तुझे देख लूँ और देख के अच्छा हो जाऊँ




तुझको सोचूँ तो तिरे जिस्म की ख़ुश्बू आए मेरी ग़ज़लों में मुहब्बत की तरह तू आए रात सीने में जले थे तिरी चाहत के दिये दिल जो पिघला तो मिरी आँख में आँसू आए क़र्ज़ है मुझपे बहुत रात की तन्हाई का मेरे कमरे में कोई चाँद न जुगनू आए लग के सोया है तिरा दर्द मिरे सीने से सुब्ह हो जाये कि जज़्बात पे क़ाबू आए पंख लगने लगे जब दिल ने किया याद उसे वो बहुत दूर था लेकिन हम उसे छू आए मैं तिरे नाम पे खामोश रहूँ, सब बोलें बातों-बातों में कोई ऐसा भी पहलू आए उसका पैकर1 कई क़िस्तों में छपे नाविल सा कभी चेह्‌रा, कभी आँखें, कभी गेसू2 आए

फिर मुझे वज़्न किया जाए शहादत3 के लिए फिर अदालत में कोई लेके तराज़ू आए अब के मौसम में ये दीवार भी गिर जाए ‘शकील’ इस तरह जिस्म की बुनियाद में आँसू आए



इक दूजे की आग में जलना अच्छा लगता है साथी हो तो पैदल चलना अच्छा लगता है मयखाने से उसकी गली तक आने-जाने में ख़ुद ही गिरना और सँभलना अच्छा लगता है पाने से भी कुछ ज़्यादा है बात न पाने में तेरी तलब में दिल का मचलना अच्छा लगता है दस्ते-दुआ1 पर फूँक के अक्सर नामे-खुदा के साथ नाम तिरा चेह्‌रे पर मलना अच्छा लगता है मिलना-जुलना बन्द है लेकिन अब भी जाने क्युँ शाम ढले तो घर से निकलना अच्छा लगता है बर्फ़ सा मेरे दिल का तेरे ग़म के मौसम में जम जाना और जम के पिघलना अच्छा लगता है मेरा भी तो कुछ रिश्ता है चाँद-सितारों से सूरज हूँ पर शाम को ढलना अच्छा लगता है



आँखों से मेरे दर्द को बहना नहीं पड़ा उसने युँही समझ लिया कहना नहीं पड़ा इक बार अपने दिल की सदा पर निकल पड़े पाबन्दियों में फिर हमें रहना नहीं पड़ा हम जब उदासियों से मिले मुस्कुरा दिए ग़म को ख़ुशी बना लिया, सहना नहीं पड़ा सोना भी कुछ उदास था चाँदी भी ग़मज़दा जब तक बदन पे प्यार का गहना नहीं पड़ा वो बेलिबास आइनाख़ाने में था मगर शीशे पे उसका अक्स बरह्‌ना1 नहीं पड़ा सदियों से मैं ग़रीब घराने का हूँ मकान सब घर बदल गए मुझे ढहना नहीं पड़ा



ख़्वाब देखो, कोई ख़्वाहिश तो करो जीना आसान है, कोशिश तो करो आज भी प्यार है दुनिया में बहुत जोड़कर हाथ गुज़ारिश तो करो जंग ये जीती भी जा सकती है ज़िन्दगी से कोई साज़िश तो करो सब्ज़ओ-गुल1 हैं इसी ख़ाक तले बनके बादल कभी बारिश तो करो लोग मरहम भी लगायेगें ‘शकील’ पहले ज़ख़्मों की नुमाइश तो करो


सर पे सूरज लिए खड़ा हूँ मैं अपनी परछाईं से बड़ा हूँ मैं किसी पत्थर से टूटता भी नहीं जाने किस फ्रेम में जड़ा हूँ मैं अपने चेहरे के धुंदलेपन के लिए कितने आईनों से लड़ा हूँ मैं अब तो ख़ुश हो, कि हार मेरी हुई हाथ बाँधे हुए खड़ा हूँ मैं मेरी मिट्टी बुला रही है मुझे जाने किस ख़ाक में गड़ा हूँ मैं फिर मुख़ालिफ़1 हैं सारे लोग मिरे फिर किसी बात पर अड़ा हूँ मैं ऊँगलियाँ उठ रही हैं मुझपे ‘शकील’ जाने किस सिम्त2 चल पड़ा हूँ मैं


सच वो क़तरा जो गुहर1 हो ही नहीं सकता था इस कमाई से तो घर हो ही नहीं सकता था वो तो तुम आबो-हवा लाए कि आबाद हुआ इस ख़राबे में नगर हो ही नहीं सकता था ये तिरे लम्स2 की गर्मी है जो हम चल निकले ऐसी सर्दी में सफ़र हो ही नहीं सकता था मोम से मेरा तअल्लुक़ था तिरा शोलों से अपना इक साथ गुज़र हो ही नहीं सकता था उस तरफ़ लोग गुनह्गार भी थे, अपने भी मैं किसी तर्ह उधर हो ही नहीं सकता था शाह को उसके पियादों से लड़ाया मैनें वरना ये मार्का3 सर हो ही नहीं सकता था सिलसिला मेरा था सूरज के घराने से ‘शकील’ मुझपे आँधी का असर हो ही नहीं सकता था


दूरियाँ बढ़ती गईं, चिट्ठी का रिश्ता रह गया सब गए परदेस घर में बाप तन्हा रह गया छोटे-छोटे रास्ते शह्‌रों में जाकर खो गए गाँव अपने साथियों की राह तकता रह गया गर्मियों की छुट्टियों में भी न आया घर कोई धीरे-धीरे पेड़ पर ही आम पकता रह गया अब कहाँ है द्वार पर बैलों की घन्टी का समाँ खेत तो अबके बरस भी गिरवी रक्खा रह गया नीम बारिश में गिरा, आँधी में जामुन गिर गई एक पीपल सब रुतों के वार सहता रह गया नाव काग़ज़ की न अबके छपकियाँ बच्चों की थीं बाढ़ का पानी गली में यूँही बहता रह गया

ज़िन्दगी की नई उड़ान थे हम अपनी मिट्टी में आसमान थे हम चाँद ने रात घर पे दस्तक दी रात भर उसके मेज़बान थे हम ढह गए इक ज़रा हवा जो चली क्या करें रेत के मकान थे हम जब तलक उसने हमसे बातें कीं जैसे फूलों के दरमियान थे हम उसको चुप-चाप सुन लिया हमने जैसे सचमुच के बेज़बान थे हम जिससे मिलती थी झूट की सरहद उस हक़ीक़त से बदगुमान थे हम लोग समझे नहीं हमें शायद मस्जिदों से उठी अज़ान थे हम


वो चाहतों के समुन्दर वो प्यास-प्यास बदन मिले तो आज बहुत ख़ुश थे दो उदास बदन फ़ज़ा में चारों तरफ़ इक नशा सा फैला था ज़माने बाद मिले थे बदन-शनास1 बदन पिघल के सोने की इक तह जमी थी कमरे में चमक रहा था अँधेरे में बेलिबास2 बदन कहीं जो बाँहों में आए तो आग लग जाए वो उँगलियों में फिसलता हुआ कपास बदन वो चार पैग की मस्ती, वो ख़्वाहिशों का ख़ुमार वो रक़्स3 करते हुए मेरे आस-पास बदन नशे में एक ही हम्माम के हुए सारे निगाहे-आम से खुलने लगे थे ख़ास बदन हमारे होंट भी सैराब4 हो गए इक दिन छलक रहा था बहुत भरके वो गिलास बदन ज़बान फेरूँ तो अब भी लहू मचलता है लबों पे छोड़ गया था कभी मिठास बदन हवा में घुल के महकने लगा था साँसों में सहर की ओस में भीगा हुआ वो घास बदन


दिल में रख ले मुझे, अरमान बना ले मुझको जिस्म मिट्टी है तिरा जान बना ले मुझको ग़ैर से देख मुझे तेरा ही चेह्‌रा हूँ मैं आइना तोड़ दे पहचान बना ले मुझको चाहता है तो मुझे ढूँढ परेशाँ होकर मैं मिलूंगा तुझे ईमान बना ले मुझको हमसफ़र होने का दर्जा जो नहीं दे सकता अपने रस्ते का तू सामान बना ले मुझको जान दे दूँगा मिरी जान हिफ़ाज़त में तिरी तू जो दिल्ली है तो सुलतान बना ले मुझको


धड़कनों में किसी दस्तक की सदा1 हो जैसे दिल का दरवाज़ा कोई खोल रहा हो जैसे जाने किस मोड़ पे ये वह्‌म हक़ीक़त बन जाय मेरे पीछे कोई साया सा लगा हो जैसे लम्स2 अहसास को कुछ ऐसे हवा देता है वो मुझे अपना बदन सौंप गया हो जैसे फ़िक्र मेरी किसी मज़दूर के घर की चौखट जिस्म मेरा कहीं रस्ते में पड़ा हो जैसे ऐसा लगता है खिले फूल पे शबनम3 का वजूद उसके होंटों पे मिरे हक़ में दुआ हो जैसे यूँ मचलती हैं समाअत4 पे हवा की लहरें उसने चुपके से मिरा नाम लिया हो जैसे यूँ समाया है हवाओं में बदन ख़ुश्बू का रुह में ग़म कोई तहलील5 हुआ हो जैसे देख लेता है मुझे वो भी कनअंखियों से ‘शकील’ मेरे मन में भी कोई चोर छुपा हो जैसे


कल हवा में बिखर गया था मैं फिर न जाने किधर गया था मैं वो था इक ख़त्म होते रस्ते सा जिसपे चलकर ठहर गया था मैं उसकी आँखों में एक दरिया था जिसमें इक दिन उतर गया था मैं अपनी नज़रों से गिरके उठ पाना ऐसा करने में मर गया था मैं उसको देखा था उससे ही छुपकर फिर वहाँ से गुज़र गया था मैं जब कहीं भी मुझे जगह न मिली अपनी आँखों में भर गया था मैं देर तक उसका इन्तेज़ार किया फिर अकेला ही घर गया था मैं


कल हवा में बिखर गया था मैं फिर न जाने किधर गया था मैं वो था इक ख़त्म होते रस्ते सा जिसपे चलकर ठहर गया था मैं उसकी आँखों में एक दरिया था जिसमें इक दिन उतर गया था मैं अपनी नज़रों से गिरके उठ पाना ऐसा करने में मर गया था मैं उसको देखा था उससे ही छुपकर फिर वहाँ से गुज़र गया था मैं जब कहीं भी मुझे जगह न मिली अपनी आँखों में भर गया था मैं देर तक उसका इन्तेज़ार किया फिर अकेला ही घर गया था मैं



कई आँखों में रहती है कई बांहें बदलती है मुहब्बत भी सियासत की तरह राहें बदलती है इबादत में न हो गर फायदा तो यूँ भी होता है अक़ीदत1 हर नई मन्नत2 पे दरगाहें बदलती है न इक सा आबो-दाना3 है, न कोई इक ठिकाना है मुसाफिर की थकन हर शब पनहगाहें बदलती है हज़ारों मंज़िलें आईं मगर ठहरा नहीं हूँ मैं अजब इक जुस्तुजू4 है जो गुज़रगाहें5 बदलती है उगे हैं बस्तियों में जो वो सब जंगल हमारे हैं हवाए- शह्‌र भी जिस वक़्त हम चाहें बदलती है





मिर्ज़ा ग़ालिब Best Shayari

1. दिल में, जौके वस्ल यादे-यार तक बाकी नही,
आग इस घर में लगी ऐसी कि जो था जल गया
दिल नही, तुझ को दिखाता वरनः दागो की बहार,
इसे चराग। का करू क्या, कारफरमा जल गया

2. बू-ए-गुल नाल-ए दिल, दूदे चरागे महफिल, जो तेरी बजम से निकला सो परीशा निकला
थी नौआमोज फना, हिम्मते दुशवार-पसद, सख्न मुश्किल है कि यह काम भी आासा निकला
दिल किर गिरियः ने इक शोर उठाया 'गालिब
आह जो कतर न निकला था, सो तुफा निकला

3.था जिन्दगी मे मौत का खटका लगा हुआ,
उडने पहले भी तो मेरा रंग जर्द था
जाती है कोई कशमकश अदोहे इश्क की,
दिल भी अगर गया, तो वही दिल का दर्द था

4.महरम नही है तू ही नवाहाए-राज का,
या वरन जो हिजाव है, पर्द है साज का
रगे शिकस्त. रावहे वहारे नजारः है,
यह वक्त है शिगुफ्तने गुलहाए नाज का

5.वस कि दुश्वार है, हर काम का आसा होना,
आदमी को भी मुयस्सर नही, इनसा होना

6. हवस को हे निशाते कार क्या क्या,
ने हो मरना तो जीने का मजा क्या.

7.न था कुछ तो खुदा था, कुछ न होता, तो खुदा होता,
डुबोया मुझ को होने ने, न होता मैं तो क्या होता.
हुआ जब गम से यू बेहिस, तो गम क्या सर के कटने का,
न होता गर जुदा तन से, तो जानू पर धरा होता

8.हुई ताखीर', तो कुछ बाइसे ताखीर भी था,
आप आते थे, मगर कोई हमागीर भी था
रेख्ती' के तुम्ही उस्ताद नही हो, गालिब',
कहते है, अगले जमाने मे कोई 'मीर' भी था

9. न गुल-ए-नगम हूँ न परदः-ए-साज
मै ह अपनी शिकस्त की आवाज.
मुझ को पूछा, तो कुछ गजब न हुआ,
मैं गरीब और तू गरीब नवाज

10..... आह को चाहिए इक उम्र, असर होने तक,
कौन जीता है तिरी जुल्फ के सर होने तक.

मिर्ज़ा ग़ालिब Best Gazals

1.  नक्श फरियादी है

नक्श फरियादी ह, किस की शोखी-ए-तहरीर का,
काग्जी है पैरहन,' हर पैकर-ए तस्वीर का

जजव -ए-वेइख्तियार-ए- शौक देखा चाहिए,
सीन -ए-शमशीर से वाहर है दम शमशीर का

जुज' कैस और कोई न आया वरु-ए-कार',
सहरा, मगर वतनगि-ए-चश्मे हुसूद' था.

आशुप्तगी ने नक्शे सुवैदा किया दुरुम्ते,
जाहिर हुआ कि दाग का सरमाया दूद था

था ख्वाव मे खयाल को तुझ से मुआमला,
जब भाख खुल गई न ज़िया था न सूद' था

ढापा कफन ने दाग अयूबे बरहनगी,
में वरनः हर लिवास में नगे वजूद था

कहते हो न देगे हम, दिल अगर पडा पाया,
दिल कहा कि गुम कीजे हम ने मुद्दआ पाया

2. कहते तो हो ना देंगे हम

कहते हो न देगे हम, दिल अगर पडा पाया,
दिल कहा कि गुम कीजे हम ने मुद्दआ पाया

इश्क से तबीयत ने जीस्त का मज़ा पाया,
दर्द की दवा पाई, दर्द लादवा पाया

दोस्तदार-ए- दुश्मन है, एतमाद-ए- दिल मालूम,
आह वेअसर देखी, नाल नारसा पाया

सादगी ओ पुरकारी, वेखुदी ओ हुशियारी,
हुस्न को तगाफुल में, जुआर  जुर्रत-अज़मा पाया

गुच फिर लगा खिलने, आज हम ने अपना दिल,
खू किया हुआ देखा, गुम किया हुआ पाया

हाले दिल नही मानूम, लेकिन उम कदर यानी,
हम ने बारहा ढूढा, तुम ने बारहा पाया

हाले दिल नही मानूम, लेकिन उम कदर यानी,
हम ने बारहा ढूंढा, तुम ने बारहा पाया

शोरे पन्दे नासेह' ने जरूम पर नमक छिडका,
आप से कोई पूछे, तुम ने क्या मजा पाया।।

3.‌ वा खुदराई को था 

वा, खुदआराई को था मोती पिरोने का खयाल,
या, हुजूमे अश्क में तारे-नगह नायाब था

जल्व -ए-गुल ने किया था वा चरागा आवजू,
या, रवा मिजगाने चश्मे तर से खूने नाब था

या नफस करता था रौशन शम-अ-वजमें बेखुदी,
जलव-ए-गुल वा विसाते-सोहबते अहवाब था.

फर्श से ता अशं, वा तूफा था मौजे रग का,
या जमी से आसमा तक सीखतन का बाब था।

नागहा, इस रंग से खूनाव टपका ने लगा,
दिल कि जौके काविशे नाखुन मे लज्जतयाब था

नाल. ए-दिल मे शब, अदाजे असर नायाब था,
था सिपदे बजमे वस्ले गैर, गो बेताब था

कुछ न की, अपने जुनूने नारसा ने, वर्न या,
ज़र्रः जर्र रूकशे खुरशीदे आलम ताब था

आज क्यो परवा नही अपने असीरो की तुझे,
कल तलक तेरा भी दिल मेहरा-ओ-वफा का वाब था

याद कर वह दिन, कि हर इक हलक तेरे दाम का,
इतज़ारे सैंद में, इक दीद- ए-बेख्वाब था

मैं ने रोका रात गालिब को, वगर्न. देखते,
उस के सैले गिरियः में, गर्दू कफे सैलाब था.

‌एक एक कतरे का मुझे देना पडा हिसाब,
खूने जिगर वदीअते मिजगाने यार' था.

अब में हू और मातमे यक शहरे आरजू,
तोडा जो तू ने आईन, तिमसालदार था

गलियो मे मेरी नअश को खीचे फिरो, कि मैं,
जा दादः-ए-हवा-ए-सरे रहगुजार था.

मौजे सराबे दश्ते बफा का न पूछ हाल,
हर ज़र्रे मिस्ले जौहरे तेग आवदार था.

कम जानते थे हम भी गमे इश्क को, पर अब,
देखा तो कम हुए पर, गमे रोजगार था


4. दोस्त गमख्वारी में मेरी 

‌दोस्त गमख्वारी मे मेरी, समि फरमाएगे क्या,
जख्म के भरने तलक, नाखुन न बढ आएगे क्या?

बेनियाजी हृद से गुजरी, वद परवर कब तलक,
हम कहेंगे हाले दिल और आप फरमाएगे क्या?

हज़रते नासेह गर आए दीदः ओ दिल फर्शेराह,
कोई मुझ को यह तो वतला दो कि समझाएगे क्या?

आज वा तेग ओ कफन बाधे हुए जाता हूँ में,
वो मेरे  कत्ल करने में वह अब लाएंगे क्या?

गर किया नासेह ने हम को कैद, अच्छा, यू सही,
ये जुनूने इश्क के अदाज़ छूट जाएगे क्या ?

खानः जादे जुल्फ है जजीर से भागेगे क्यो,
है गिरिफ्तारे वफा, जिंदा से घबराएगे क्या?

है अव इस मामूर' मे कहते गमे उलफत असद,
हम ने यह माना कि दिल्ली में रहे, खाएगे क्या?

5. कि यू होता तो क्या होता

‌यह न थी हमारी किस्मत, जो विसाले यार होता,
अगर और जीते रहते, यही इंतजार होता

तिरे वादे पर जिए हम, तो यह जान झूट जाना,
कि खुशी से मर जाते, अगर एतबार होता

हुए मर के हम जो रुसवा, हुए क्यो न ग्रके दरिया,
न कभी जनाज़ः उठता, न कहीं मज़ार होता

उसे कौन देख सकता कि यगान है बह सकता,
जो दुई की बु भी होती, तो कही दोचार होता

यह मसाइले तसव्वुफ यह तिरा वयान, 'गालिव',
तुझे हम वली समझते, जो न बादःख्वार होता

‌घर हमारा, जो न रोते, तो भी वीरा होता,
बहर अगर वह्र न होता, तो बयाबा होता

तगि-ए-दिल का गिला क्या, यह वह काफिर दिल है,
कि अगर तंग न होता, तो परीशा होता

वादे यक उम्रे वर अ, वार तो देता, बारे,
काश, रिज्वा' ही दरे यार का दरबा होता

‌न था कुछ तो खुदा था, कुछ न होता, तो खुदा होता,
डुबोया मुझ को होने ने, न होता मैं तो क्या होता.

हुआ जब गम से यू बेहिस, तो गम क्या सर के कटने का,
न होता गर जुदा तन से, तो जानू पर धरा होता

हुई मुद्दत, कि गालिब मर गया, पर याद आता है,
वह हर इक बात पर कहना, कि यू होता तो क्या होता

6. फिर मुझे दीद -ए - तर याद आया

‌फिर मुझे दीद -ए-तर याद आया,
दिल जिगर, तशन -ए-फरियाद आया

दम लिया था न कयामत ने हनोज',
फिर तेरा वक्ते सफर याद आया.

सादगी हाए-तमन्ना यानि,
फिर वह नेरगे नज़र याद आया

उजरे वामादगी, ऐ हसरते दिल,
नाल करता था,  जिगर याद आया

जिंदगी यू भी गुज़र ही जाती,
क्यो तेरा राहगुज़र याद आय।

आह वह जुर्रबत-ए-फरियाद कहा,
दिल से तग आ के जिगर याद आया

फिर तेरे कुचे को जाता है खयाल,
दिल-ए-गुमगशत , मगर याद आया

कोई वीरानी सी वीरानी है,
दश्त को देख के घर याद आया

मैं ने मजनू पे लडकपन में, 'असद,
सग उठाया था, कि सर याद आया

7. हुई तारीख 
‌
हुई ताखीर', तो कुछ बाइसे ताखीर भी था,
आप आते थे, मगर कोई हमागीर भी था

रेख्ती' के तुम्ही उस्ताद नही हो, गालिब',
कहते है, अगले जमाने मे कोई 'मीर' भी था

आईनः देख, अपना सा मुह ले के रह गए,
साहब को, दिल न देने पे कितना गुरूर था.

कासिद' को अपने हाथ से गरदन न मारिए,
उस की खता नहो है, यह मेरा कुसुर था

‌अर्ज बो नियाज़-ए-इश्क के काविल नही रहा,
जिस दिल पे नाज़ था, मुझे वह दिल नही रहा

मरने की, ऐ दिल, और ही तदबीर कर, कि में,
शायाने-दस्त ओ वाजुए कातिल नही रहा

दिल से हवा-ए-किश्ते-वफा मिट गई, कि वा,
हासिल, सिवाय हसरते-हासिल नही रहा

बेदाद'-ए-इश्क से नहीं डरता, मगर 'असदं,
जिस दिल पे नाज़ था मुझे, वह दिल नही रहा

8. लाजिम था की देखो मीरा
‌लाजिम था कि देखो मिरा रस्तः कोई दिन और,
तनहा गए क्यो, अब रहो तनहा कोई दिन और.

मिट जाएगा सर, गर तिरा पत्थर न घिसेगा,
हं दर पे तिरे नासिय फरसा कोई दिन और

आए हो कल और आज ही कहते हो, कि जाऊ,
माना, कि नही आज से अच्छा, कोई दिन और

जाते हुए कहते हो, कयामत को मिलेंगे,
क्या खूब, कयामत का है गोया कोई दिन और

हा ऐ फलक-ए-पीर, जवा था अभी आरिफ,
क्या तेरा विगडता जो न मरता कोई दिन और

तुम माह-ए-शब-ए-चार दहुम थे, मेरे घर के,
फिर क्यो न रहा घर का वह नक्शा कोई दिन और

तुम कौन से थे ऐसे खरे, दादा-ओ-सितद' के
करता मलेकुल मोत तकाजा, कोई दिन और

मुझ से तुम्हे नफरत सही, नय्यर से लड़ाई,
बच्चो का भी देखा न तमाशा कोई दिन और.

गुजरी न बहरहाल यह मुद्दुत खुशा-ओ-नाखुश,
करना था, जवामगं, गुज़ारा कोई दिन और.

नादान है, जो कहते हैं क्यो जीते हो 'गालिव',
मुझ को तो है मरने की तमन्ना कोई दिन और.

9. आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक

‌आह को चाहिए इक उम्र, असर होने तक,
कौन जीता है तिरी जुल्फ के सर होने तक.

दाम-ए-हर मौज में है, हल्क.-ए-सद कामे-निहग,
देखें क्या गुजरे है कतरे पे गुहर होने तक

आशिकी सब्र तलब और तमन्ना बेताव,
दिल का क्या रग करू, खूने-जिगर होने तक

हम ने माना कि तगाफुल न करोगे लेकिन,
खाक हो जाएँगे हम, तुम को खवर होने तक

परंतव'-ए-खुर' से है शबनम को, फना की तालीम ,
में भी हू एक अिनायत की नजर होने तक

गम-ए-हस्ती का, 'असद' किस से हो जुज मर्ग इलाज,
शमा हर रंग मे जलती है सहर होने तक

10. की वफ़ा हम से तो गैर 

‌की वफा हम से, तो गैर उन को जफा कहते है,
होती आई है, कि अच्छों को बुरा कहते हैं।

आज हम अपनी परीशानि-ए-खातिर उन से,
कहने जाते तो हे, पर देखिए क्या कहते है।

अगले वक्तो के है यह लोग, इन्हे कुछ न कहो,
जो मैं-ओ-नगम. को, अदोहरुवा कहते हैं।

दिल में आ जाए है, जो होती है फुरसत गश से,
और फिर कौन से नाले को रसा कहते हैं।

इक शरर दिल में है, उस से कोई घबराएगा क्या,
आग मतलूब है हम को, जो हवा कहते है।

देखिए लाती है उस शोख की नखवत,' क्या रंग,
उस की हर बात पे हम, नामे खुदा कहते हैं

वहशत'-ओ-शेफ्त.' अव मरसिय कहवे शायद,
मर गया 'गालिव'-ए-आशुफ्त -नवा, कहते है

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अहमद फ़राज़ Best Shayari


1.हम अपनी रूह तेरे जिस्म में छोड़ आए फ़राज़
तुझे गले से लगाना तो एक बहाना था


2.अपने ही होते हैं जो दिल पे वार करते हैं फ़राज़
 वरना गैरों को क्या ख़बर की दिल की जगह कौन सी है

3.मैं तुझे खोके भी जिन्दा हूँ ये देखा तूने,
किस कदर हौसला हारे हुए इंसान में है।
फासले कुर्ब के शोलों को हवा देते हैं,
मैं तेरे शहर से दूर और तू मेरे ध्यान में है।

4.मैं शब का भी मुजरिम था सहर का भी गुनहगार,
लोगों मुझे इस शहर के आदाब सीखा दो।

5.इससे पहले कि बेवफा हो जायें,
क्यों न ऐ दोस्त हम जुदा हो जायें।
तू भी हिरे से बन गया पत्थर,
हम भी कल जाने क्या से क्या हो जायें।

6.लूट चूके इश्क में इक बार तो फिर इश्क करो,
किसको मालूम कि तकदीर सँवर भी जाये।

7.गनीम से भी अदावत में हद नहीं मांगी,
की हार मान ली लेकिन मदद नहीं माँगी।

8.जिंदगी तेरी अता थी सो तेरे नाम की है,
हमने जैसे भी बसर की तेरा एहसान ही है।

9.जो रंजिशें थी जो दिल में गुबार था न गया,
की अब की बार गले मिल के भी गिला न गया।
सभी को जान थी प्यारी सभी थे लब बस्ता,
बस इक फ़राज़ था जालिम से चुप रहा न गया।

10.जिस्म शोला है जभी जामा-ए-सादा पहना,
मेरे सूरज ने भी बादल का लबादा पहना।
सलवटें हैं मेरे चेहरे पे तो हैरत क्यों हैं,
जिंदगी ने मुझे कुछ तुम से जियादा पहना।

11.शायद कोई ख्वाइश होती रहती है,
मेरे अंदर कोई बारिश होती रहती है।

12.इतना सोचा भी ना था अब के तो तन्हा गुजरी,
वो कयामत ही गमगीन थी जो यकजा गुजरी।
आ गले तुझ को लगा लूं मीरे प्यारे दुश्मन,
एक मिरी बात नहीं तुझ पे भी क्या क्या गुजरी।

13.तड़प उठूं भी तो जालिम तेरी दुहाई न दूँ,
मैं जख्म जख्म हूँ फिर भी तुझे दिखाई न दूँ।
तेरे बदन में धड़कने लगा हूँ दिल की तरह,
ये और बात की अब भी तुझे सुनाई न दूँ।

14.वही इश्क जो था कभी जुनूँ उसे रोजगार बना दिया,
कहीं ज़ख्म बेच के आ गए कहीं शेर कोई सुना दिया।

15.किसी दुश्मन का कोई तीर ना पहुंचा मुझ तक,
देखना अब की मेरा दोस्त कॉमन खींचता है।

16.न शबो रोज ही बदले है न हाल अच्छा है,
किस ब्राह्मण ने कहा था कि ये साल अच्छा है।
मैंने पुछा था कि आखिर ये तगाफुल कब तक,
मुस्कुराते हुए बोले कि ये सवाल अच्छा है।

17.जिस्म बिल्लोर सा नाजुक है जवानी भरपूर,
अब के अंगड़ाई न टूटी तो बदन टूटेगा।।

अहमद फ़राज़ Best gazals

1.     आईना

तुझ से बिझड़ा हूँ तो आज आया मुझे अपना ख्याल,
एक कतरा भी नहीं बाकी की हों पलकें तो नम।
मेरी आँखों के समुन्दर कौन सहारा पी गए,
एक आंसू को तरसती है मिरी तक्रिबें गम।

मैं न रो पाया तो सोचो मुस्कुरा कर देख लूँ,
शायद उस बेजान पैकर में कोईं जिन्दा हो ख्वाब।
और लबों के तन बरहना शाखों पर अब कहाँ,
मुस्कुराहट के शुगूफ़े खदां-एं-दिल के गुलाब ।

कितना वीरान हो चूका है मेरी हंसती का जमाल,
तुझ से बिछड़ा हूँ तो आज आया मुझे अपना ख्याल।।

2.बाज़ औकाद,अक्सर औकाद

भूल जाएं तो आज बेहतर है
सिलसिले कुर्बे के जुदाई के,
बुझ चुकी ख्वाइशों की कंदिलें
लूट चुके शहर आशनाई के।

रायेगा साअतों से क्या लेना,
जख्म हों फूल तो सितारे हों,
मौसमों को हिसाब क्या रखना,
जिस ने जैसे भी दिन गुजारे हों।

जिंदगी से शिकायतें कैसी,
अब नहीं हैं अगर गीले थे कभी
भूल जायें की जो हुआ सो हुआ,
भूल जायें की हम मिलें ये कभीं।

अक्सर औकाद चाहने पर भी,
फासलों में कभी नहीं होती,
वाज औकाद जाने वालों की,
वापसी से ख़ुशी नहीं होती।

3. मत कत्ल करों आवाजों को!

तुम अपने अक़ीदों के नेजे,
हर दिल में उतारे जाते हो
हम लोग मुहब्बत वाले हैं
तुम ख़ंजर क्यों लहराते हो,
इस शहर में नगमें बहनें दो
बस्ती में हमें भीं रहने दो।

हम पालनहार हैं फूलों के,
हम खुश्बू के रख्वालें हैँ।
तुम किस का लहू पिने आए
हम यार सिखाने वाले हैं।

उस शहर में फिर क्या देखोगे,
जब हर्फ़ यहां मर जायेंगे।


4.  लग जाते है

रोग ऐसे भी गमे यार से लग जाते हैं,
दर से उठते हैं तो दीवार से लग जाते हैं।
इश्क आगाज में हल्की सी कलिश रखता है,
बात में सैंकड़ों आजार से लग जाते है।
पहले पहले हवस एक आध दुकान खोलती है,
फिर तो बाजार के बाजार से लग जाते हैं।
बेबसी भी कभी क़ुरबत का सबब बनती हैं,
रो न पाएं तो गले यार से लग जाते हैं।
कतरनें गम की जो गलियों में उड़ी फिरती हैं,
घर में ले आओ तो अम्बार से लग जाते हैं।
आबल आबल कर देती है जब दिल को फराज,
पर्दा इल्जाम तो इजहार से लग जाते हैं।


5. अच्छा लगा

गुफ्तगू अच्छी लगी जीके नजर अच्छा लगा,
मुदतों के बाद कोई हमसफ़र अच्छा लगा।
दिल का दुःख जाना तो दिल का मसअला है पर हमें,
उसका हंस देना हमारे हाल पर अच्छा लगा।
हर तरह की बे- सरों-सामनियों के बावजूद,
आज वो आया तो मुझको अपना घर अच्छा लगा।
क्या बुरा था गर पड़ा रहता तेरी दहलीज पर,
तू ही बतला क्या तुझे वो दर बदर अच्छा लगा।
हम भी कायल हैं वफ़ा ए उस्तवरी के मगर,
कोई पूछे कौन किसको उम्र भर अच्छा लगा।
मीर की मानिंद गरचे जीस्त करता था फ़राज़,
हमको वो अशुफ्ता खु शायर मगर अच्छा लगा।


6.  रंजीश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ,
आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ।
कुछ तो मेरे पीरांदे मोहब्बत का भरम रख,
तू भी तो कभी मुझको मनाने के लिए आ।
पहले से मरासिम न सही फिर भी कभी तो,
रस्मों रहे दुनिया ही निभाने के लिए आ।
किस किस को बताएंगे जुदाई का सबब हम,
तू मुझ से खफा है तो जमाने के लिए आ।
इक उम्र से हूँ लज्जते गिरय से भी महरूम,
ऐ राहते जां मुझको रुलाने के लिये आ।
अब तक दिल खुश फ़हम को तुझ से हैं उमीदें,
ये आखिरी शमएं भी बुझाने के लिए आ।


7.ऐसे चुप है
ऐसे चुप हैं कि ये मंजिल भी कड़ी हो जैसे,
तेरा मिलना भी जुदाई की घड़ी हो जैसे।
अपने ही साए से हर गाम लरज जाता हूँ,
रास्ते में कोई दीवार खड़ी हो जैसे।
कितने नादां हैं तेरे भूलने वाले कि तुझे,
याद करने के लिए उम्र पड़ी हो जैसे।
तेरे माथे की शिकन पहले भी देखी थी मगर,
ये गिरह अबके मेरे दिल में पड़ी हो जैसे।
मंजिल दूर भी हैं मंजिलें नजदीक भी हैं,
अपने ही पाँव में जंजीर पड़ी हो जैसे।
आज दिल खोल के रोएं है तो खुश है फ़राज़,
चन्द लम्हों की ये राहत भी बड़ी हो जैसे।

8.मिलें

अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख्वाबों में मिलें,
जिस तरह सूखे फूल किताबों में मिलें।
ढूंढ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती,
ये खजाने तुझे मुमकिन है खराबों में मिलें।
गमें दुनिया भी गमें यार में शामिल कर लो,
नश्शा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें।
तू खुदा है न इश्क फरिश्तों जैसा,
दोनों इंसां हैं तो क्यों इतने हिजाबों में मिलें।
आज हम दार पे खींच गए जिन बातों पर,
क्या अजब कल वो जमाने को निसाबों में मिलें।
अब न वो हैं न वो तू न वो मोजी है फ़राज़,
जैसे दो शख्श तमन्ना के सराबों में मिलें।।

9. सुना हे लोग उसे

सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं
सो उसके शहर में कुछ दिन ठहर के देखते हैं
सुना है रब्त है उसको ख़राब-हालों से
सो अपने आप को बर्बाद कर के देखत हैैं
सुना है दर्द की गाहक है चश्म-ए-नाज़ उसकी
सो हम भी उसकी गली से गुज़र के देखते हैं
सुना है उसको भी है शेर-ओ-शायरी से शगफ़
सो हम भी मोइज़े अपने हुनर के देखते हैं
सुना है बोले तो बातों से फूल झड़ते हैं
ये बात है तो चलो बात कर के देखते हैं
सुना है रात उसे चाँद तकता रहता है
सितारे बाम-ए-फलक से उतर के देखते हैं
सुना है दिन को उसे तितलियाँ सताती हैं
सुना है रात को जुगनूं ठहर के देखते हैं
सुना है रात से बढ़ कर है काकुलें उसकी
सुना है शाम को साये गुज़र के देखते है
सुना है हश्र है उसकी ग़ज़ाल सी आँखें
सुना है उसको हिरन दश्तभर के देखते हैं
 सुनै है उस की स्याह चश्मगी क़यामत है
सो उसको सुरमाफ़रोश आँख भर के देखते हैं
सुना है उसके लबों से गुलाब जलते हैं
सो हम बहार पे इलज़ाम धर के देखते है
सुना है आइना तमसाल है ज़बीं उसकी
जो सादादिल हैं उसे बन संवर के देखते हैं
सुना है उसके बदन की तराश ऐसी है
की फूल अपनी कबायें क़तर के देखते हैंं
बस इक निगाह में लुटता है काफ़िला दिल का
सो रह-रवां-ए-तमन्ना भी डर के देखते है
सुना है उसके सबिस्तां से मुत्तसिल है बहिश्त
मकीं उधर के भी जलवे इधर के देखते हैैं
किसे नसीब के बे-पैरहन उसे देखे
कभी कभी दर-ओ-दीवार घर के देखते हैं
रुकें तो गर्दिशें उसका तवाफ़ करती हैं
चलें तो उसको ज़माने ठहर के देखते हैैं
कहानियाँ ही सही, सब मुबालगे ही सही
अगर ये ख़्वाब है, ताबीर कर के देखते हैं
 उसके शहर में ठहरें कि कूच कर जाए

‘फ़राज़’ आओ सितारे सफ़र के देखते हैं



10.अभी कुछ और करिश्में

अभी कुछ और करिश्में गजल के देखते है,
फ़राज अब जरा लहजा बदल कर देखते हैं।
जुदाईयां तो मुकद्दर हैं फिर भी जाने सफर,
कुछ और दूर जरा साथ चल के देखते है।
रहे वफ़ा में हरिफे खिराफ़ कोई तो हो,
सो अपने आप से आगे निकल के देखते हैं।
तू सामने है तो फिर क्यूं यकीं नहीं आता
ये बार बार आंखों को मल के देखतें हैं।
ये कौन लोग हैं मौजूद तेरी महफ़िल में,
जो लालचों से तझे मुझको जल के देखते हैं।
ये कुर्ब क्या है कि यकजा हुए न दूर रहे,
हजार एक ही कालिब में ढल के देखते हैं।
न तुझको मात हुई है न मुझको मात हुई ,
सो अब के दोनों ही चालें बदल के देखते हैं।
ये कौन है सरे साहिल की डूबने वाले
समन्दरों की तहों से उछल के देखते हैं।
अभी तलक तो न कुन्दन हुए न राख हुए,
हम अपनी आग में हर रोज जल के देखते हैं।
बहुत दिनों से नहीं हैं कुछ उसकी खैर खबर,
चलो फ़राज़ कुए यार चलके देखते हैं।